Pahli Aurat : Rana Liyaqat Begam By Rajgopal Singh Verma
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हमारी स्मृतियों में जो मुस्लिम लीग के कद्दावर नेता और फिर पाकिस्तान के पहले प्रधानमन्त्री बने लियाक़त अली ख़ान कइ हमनवा बन राना बेगम के नाम से जानी गई। राजगोपाल सिंह वर्मा कइ यह किताब उन्हीं के किरदार कइ एक रोचक कहानी है।
आजादी और विभाजन के द्वैत ने बाक़ी सब तो बाँटा ही, हमारे पुरखों को भी बाँट दिया। जो हिन्दुस्तान रह गये, उन्हें पाकिस्तान ने गैर मान लिया तो जो पाकिस्तान चले गये, उन्हें हिन्दुस्तान ने अपना नहीं माना। ऐसे में धर्म-परिवर्तन कर ईसाई बनने वाले अल्मोड़ा के पन्त परिवार की उस बेटी आइरीन पन्त को तो कहाँ ही कोई जगह मिलनी थी हमारी स्मृतियों में जो मुस्लिम लीग के क़द्दावर नेता और फिर पाकिस्तान के पहले प्रधानमन्त्री बने लियाकत अली ख़ान की हमनवा बन राना बेगम के नाम से जानी गयी। राजगोपाल सिंह वर्मा की यह किताब उन्हीं के किरदार की एक रोचक कहानी है। लेखक ने बेहद आमफ़हम भाषा और औपन्यासिक कलेवर के साथ इतिहास के एक उलझे हुए दौर को इस तरह पेश किया है कि इसे एक बार में पहले से आख़िरी पन्ने तक पढ़ लिया जाए।
उस दौर में जब महिलाओं को पढ़ने-लिखने के इतने अवसर नहीं मिलते थे आइरीन पन्त से राना बेगम तक का वह सफ़र आसान नहीं था। ईसाई धर्म अपनाने वाला ब्राह्मण परिवार भी अपनी बेहद पढ़ी-लिखी बेटी के एक मुस्लिम से सम्बन्धों को स्वीकार नहीं कर पाया और बेगम साहिबा कभी लौटकर अल्मोड़ा नहीं जा सकीं। हालाँकि लियाक़त साहब से उन्हें बेपनाह मुहब्बत और इज्जत मिली लेकिन उनका साथ भी लम्बा नहीं चला जब एक अनसुलझी साजिश में उनकी हत्या हो गयी और राना बेगम को अपने परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ लिये एक लम्बा सफर तय करना पड़ा।
राजगोपाल जी ने एक खुद्दार औरत के इस मुश्किल लेकिन रोमांचक और सफल सफ़र को बड़ी संजीदगी से दर्ज किया है। उनके बयान में इतिहास की उनकी समझ ने पाठकों के लिए आज़ादी के पहले की जद्दोजहद, काँग्रेस और मुस्लिम लीग की कशमकश और बँटवारे के बाद बने नये मुल्क पाकिस्तान की भीतरी राजनीति के तमाम पहलुओं का पसेमंजर भी पेश किया है। राना बेगम के इर्द-गिर्द घटी घटनाओं से गुज्जरते हुए आप लियाक़त अली ख़ान ही नहीं बल्कि जिन्ना सहित उस दौर के अनेक किरदारों से क़रीबी परिचय हासिल करते हैं।
किताब का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा वह है जहाँ राजगोपाल लियाक़त की मौत के बाद राना बेगम के संघर्षों को दर्ज करते हैं। हालाँकि इसे पढ़ते हुए लगातार लगता है कि यह थोड़े और विस्तार से आता तो बेहतर होता लेकिन पाकिस्तान जैसे समाज में लगातार महिला अधिकारों के लिए लड़ती और जिया उल हक़ की तानाशाही के दौर में मानव अधिकारों तथा जम्हूरियत के हक़ में आवाज उठातीं बेगम राना एक ऐसी महिला के रूप में सामने आती हैं जिन्हें न दुख तोड़ सके न ही सुविधाएँ भ्रष्ट कर सकीं। दक्षिण एशिया के इतिहास में ऐसे किरदार कम ही देखने को मिलते हैं। इस तरह वह किसी एक मुल्क की सरहदों तक महदूद नहीं रह जातीं बल्कि अपने संघर्षों और अपनी जिजीविषा से पूरी दुनिया की औरतों के लिए एक मिसाल कायम करती हैं। यह उनकी आला तालीम ही थी जिसने पाकिस्तान के समाज और उसकी राजनीति में उन्हें वह मक़ाम हासिल करने में मदद की जिससे वह ‘मादर-ए-मिल्लत’ ही नहीं ‘निशान-ए-इम्तियाज’ तक की हक़दार हुईं, कई मुल्कों में राजदूत की हैसियत से रहीं और जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर में पाकिस्तान की वित्त मन्त्री के रूप में ऐसी आर्थिक नीतियों की प्रणेता बनीं जिन्होंने वहाँ के गरीब-वंचित लोगों के लिए रास्ते खोले।
राना बेगम पर हिन्दी में यह पहली किताब लिखने के लिए राजगोपाल सिंह वर्मा बधाई और शुभकामनाओं के पात्र हैं। यह किताब हिन्दी पाठकों को न केवल गुजरे दौर की एक ज्जरूरी शख्सियत से रूबरू कराएगी बल्कि दोनों मुल्कों के बीच जिस क़दर एक-दूसरे को लेकर बेरुखी और अजनबियत पसरी है, उसे कम करने में एक भूमिका भी निभाएगी। मुझे पूरी उम्मीद है कि पाठक इस रोचक किताब को हाथोहाथ लेंगे।
– अशोक कुमार पाण्डेय

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