Rang Yatriyo Ke Rahe Guzar by Satya Dev Tripathi

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लेकिन इसी सिलसिले में कुछ गिने-चुने लोगों के साथ मानवोचित प्रक्रिया में ऐसे सह-सम्बन्ध भी बने, जिसमें नाटक तो मूल आधार बना और अन्त तक प्रमुख सरोकार बनकर रहा भी, लेकिन उसमें मानवीय प्रवृत्तियाँ नाटक की सीमाओं को लाँघकर जीवनपरक भी हो गयीं-सिर्फ़ नाटक को होने की मोहताज न रहीं। और यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं, कि जीवन से जुड़ जाने के बाद उनके साथ उनके रंगकर्म को समग्रता में जानने-समझने का लुत्फ़ ही कुछ और हो गया। इनमें कुछ बुजुर्ग व महनीय लोगों (ए.के. हंगल, हबीब तनवीर, सत्यदेव दुबे… आदि) से अकूत स्नेह मिला, अनकही सुरक्षा मिली और काफ़ी कुछ सीखने-जानने को मिला…, तो वहीं कुछ हमउम्री के आसपास के रंगकर्मियों के साथ अहर्निश के रिश्ते बने। आपसी दुख-सुख एक हो गये। उनके साथ से संघर्षों-चुनौतियों में सम्बल मिले।
– आमुख से

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