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  • Phnom Pen Ki Jal-Katha – Asit K. Biswas, Pawan K. Sachdeva, Cecilia Tortajada

    Phnom Pen Ki Jal-Katha – Asit K. Biswas, Pawan K. Sachdeva, Cecilia Tortajada

    नोम पेन्ह की जल कथा को साझा करने का उद्देश्य यह है कि दुनिया भर के कई शहर इसके परिणामों को दोहराने में सक्षम होंगे और एक ऐसी दुनिया का एहसास करने में मदद करेंगे जहाँ सुरक्षित जल लोगों को सार्वभौमिक रूप से उपलब्ध है।

    404.00449.00
  • Allah Naam Ki Siyasat – Hilal Ahmed

    Allah Naam Ki Siyasat – Hilal Ahmed
    ‘अल्लाह नाम की सियासत’ – हिलाल अहमद

    अल्लाह नाम की सियासत एक बेहद विचारोत्तेजक पुस्तक है। यह किताब ऐसे वक्त आयी है जब भारत में मुसलमानों और इस्लाम को लेकर बहुत सारी गलतफ़हमियों और अज्ञान का बाज़ार गर्म है।


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    359.00449.00
  • Samajwad Kyon? – Jaiprakash Narayan Translation Ashok Kumar

    Samajwad Kyon? – Jaiprakash Narayan Translation Ashok Kumar

    इस पुस्तक का उद्येश्य समाजवाद की सैद्धान्तिक व्याख्या करना नहीं हैं। यह पुस्तक इसलिए लिखी गयी है कि राष्ट्रीय आन्दोलन के वर्तमान चरण में उभरी कुछ समस्याओं, और इस आन्दोलन की भावी दिशा से सम्बन्धित मसले पर प्रकाश डाला ज सके।

    166.00195.00
  • Sangharsh Ke Tever – Nivedita Menon Translation. By Naresh Goswami

    Sangharsh Ke Tever – Nivedita Menon Trans. By Naresh Goswami

    संघर्ष के तेवर – निवेदिता मेनन

    संघर्ष के तेवर पुस्तक भारत में रैडिकल राजनीति-खासतौर पर नारीवादी राजनीति की कशमकश का जायजा लेने की कोशिश करती है।

    428.00475.00
  • Vartman Vikas Ki Seemayein – Sachchidanand Sinha

    Vartman Vikas Ki Seemayein – Sachchidanand Sinha
    वर्तमान विकास की सीमाएँ – सच्चिदानन्द सिन्हा

    प्रस्तुत पुस्तक में उन प्रतिमानों के सांस्कृतिक एवं अन्य तत्वों पर विचार किया गया है जो मौजूदा सभ्यता के आधार हैं और इनकी विसंगतियों की और ध्यान खींचा गया है।.

    179.00199.00
  • Rashtravaad Ki Sachchai Aur Jhooth – Parth Chatterji-Parth Chatterjee

    Rashtravaad Ki Sachchai Aur Jhooth – Parth Chatterjee Translation By Aanand Swaroop Verma

    राष्ट्रवाद की सच्चाई और झूठ – पार्थ चटर्जी

    इस पाण्डुलिपि के रचयिता का इरादा कोई ऐसा मिथकीय चरित्र गढ़ना हो जिसके जरिए वह भारतीय राष्ट्रवाद की नयी अवधारणा के सिद्धांतों को सामने लाये।

    449.00499.00
  • Chinhat 1857 : Sangharsh Ki Gourav Gatha – Rajgopal Singh Verma

    Chinhat 1857 : Sangharsh Ki Gourav Gatha – Rajgopal Singh Verma

    276.00325.00
  • Aasman Aur Bhi Hain By Aditya Nigam

    Aasman Aur Bhi Hain By Aditya Nigam

    इस पुस्तक का सरोकार राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में ज्ञान के वि-उपनिवेशिकरण और वैचारिक स्वराज से है। यह पुस्तक पश्चिम से मिले दर्शन को सिद्धान्त-निर्माण के एकमात्र स्रोत के रूप में स्वीकार करने के बजाय अपने तजुर्बों को प्राथमिकता देने पर जोर देती है।

    276.00325.00
  • Striyon Ko Gulam Kyon Banaya Gaya – Periyar E.v. Ramasami

    Striyon Ko Gulam Kyon Banaya Gaya – Periyar E.v. Ramasami Translation By Omprakash Kashyap

    इस पुस्तक में जिन मुद्दों पर विचार किया गया है, वे सामाजिक अवरोधकों, पुण्य-शीलता, रूढ़िवादी रीति-रिवाजों, धर्मादेशों, पवित्र धर्मग्रन्थों में दर्ज आचार-संहिताओं तथा इनके प्रभाव से अभी तक निर्मित जनभावनाओं और तत्सम्बन्धी तथ्यों का जमकर विरोध करते हैं।

    166.00195.00
  • Dharma, Sanskriti Aur Rajneeti By Shashank Chaturvedi

    Dharma, Sanskriti Aur Rajneeti By Shashank Chaturvedi

    शशांक चतुर्वेदी द्वारा इस पुस्तक में धर्म के अर्थ कइ विस्तृत श्रेणी कइ उपयोगिता, नाथ सम्प्रदाय के संक्षिप्त इतिहास और हिंदुत्ववादी राजनीति कइ उसमें बढ़ती भूमिका के साथ-साथ गोरखपुर कइ राजनीति में गोरखपुर

    208.00245.00
  • Buddhijiviyon Ki Jimmedari – RaviBhushan

    Buddhijiviyon Ki Jimmedari RaviBhushan
    बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी – रविभूषण

    आलोचक के रूप में रविभूषण का नाम काफी जाना-पहचाना है। लेकिन बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी साहित्यिक आलोचना की किताब नहीं है। इस किताब में वह एक बुद्धिजीवी और राजनीतिक विश्लेषक के रूप में सामने आते हैं। 

    468.00550.00
  • Manushya Ka Avakash – Kumar Ambuj (Paperback)

    Manushya Ka Avakash – Kumar Ambuj (Paperback)

    ‘मनुष्य का अवकाश’ मुख्यतः श्रम, धर्म और प्रतिरोध की आंतरिक एकसूत्रता से निर्मित है। इन निबंधों के अतिरिक्त पुस्तक में एक कहानी भी है। यह कहानी विषय के आंतरिक साम्य के कारण यहाँ है। वास्तव में श्रम और प्रतिरोध ही वे मानवीय संदर्भ हैं, जिनसे मानव जाति निरंतर विकसित होते हुए, विकास की विभिन्न मंजिलों को पार करते हुए, यहाँ तक पहुँची है। ये निबंध इन प्रसंगों में मनुष्यता की निरंतरता में, उसके इन सकारात्मक पक्षों को तो प्रस्तावित करते ही हैं, साथ ही वे आज मनुष्य की प्रतिगामी शक्तियों के संदर्भ भी उद्घाटित करते हैं। इस संदर्भ में भी वे प्रतिरोध और श्रम की भूमिका प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में रेखांकित करते चलते हैं। ‘मनुष्य का अवकाश’ कवि कुमार अंबुज का वैचारिक संसार है। कविताओं का वैचारिक संसार प्रच्छन्न होता है, पर कवि जब खुद वैचारिक साहित्य रचता है, तो पाठक उसमें सिर्फ वैचारिक सामग्री नहीं पाते, अपितु वह उसके रचनात्मक संसार को भी प्रोद्भासित करता है। मनुष्य का अवकाश’ कुमार अंबुज के वैचारिक मानस के साथ उनके कवि व्यक्तित्व की समझ का भी एक कोण उभारता है। इन निबंधों में विचार की सहधर्मी है उनकी काव्यात्मक भाषा। अगर गद्य कवियों की कसौटी है, तो उस गद्य को निखारने में कवियों की काव्यात्मक भाषा की मुख्य भूमिका होती है। कुमार अंबुज का गद्य सार्थक है तथा इसकी सफलता का आधार भाषा की काव्यात्मकता भी है।

    119.00140.00