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  • Manushya Ka Avakash – Kumar Ambuj

    Manushya Ka Avakash – Kumar Ambuj

    मनुष्य का अवकाश’ मुख्यतः श्रम, धर्म और प्रतिरोध की आंतरिक एकसूत्रता से निर्मित है। इन निबंधों के अतिरिक्त पुस्तक में एक कहानी भी है। यह कहानी विषय के आंतरिक साम्य के कारण यहाँ है।

    270.00300.00
  • Anunad By Arun Khopkar – Hardcover

    Anunad By Arun Khopkar Hardcover
    `अनुनाद`-अरुण खोपकर

    `अनुनाद` साहित्य और सिनेमा के क्षेत्र में समान अधिकार से संचार करने वाले अरुण खोपकर के चौदह लेखों का संग्रह है। अरुण खोपकर के समग्र लेखन में विश्व-बोध के साथ आसपास की गहन संवेदनाओं का संतुलन साधा गया है। 

    792.00990.00
  • Bharat Shudron Ka Hoga – Kishan Patnayak (Paperback)

    Bharat Shudron Ka Hoga – Kishan Patnayak
    भारत शूद्रों का होगा – किशन पटनायक

    भारत शूद्रों का होगा
    वरिष्ठ राजनैतिक विचारक-कार्यकर्ता किशन पटनायक की यह पहली पूरी किताब है। जाहिर है इसे छापते हुए कोई भी प्रकाशक निहाल होता-हमारे जैसे नये प्रकाशन के लिए तो यह गौरव की बात ही है।

    126.00140.00
  • Bharat Shudron Ka Hoga – Kishan Patnayak

    Bharat Shudron Ka Hoga – Kishan Patnayak
    भारत शूद्रों का होगा – किशन पटनायक

    भारत शूद्रों का होगा
    वरिष्ठ राजनैतिक विचारक-कार्यकर्ता किशन पटनायक की यह पहली पूरी किताब है। जाहिर है इसे छापते हुए कोई भी प्रकाशक निहाल होता-हमारे जैसे नये प्रकाशन के लिए तो यह गौरव की बात ही है।

    248.00275.00
  • Yeh Kya Jagah Hai Dosto… Varvar Rao (Paperback)

    Yeh Kya Jagah Hai Dosto… Varvar Rao

    315.00350.00
  • Yeh Kya Jagah Hai Dosto… Varvar Rao

    Yeh Kya Jagah Hai Dosto… Varvar Rao

    639.00799.00
  • Kahan Aa Gaye Hum Vote Dete-Dete? -Ravibhushan

    Kahan Aa Gaye Hum Vote Dete-Dete? By Ravibhushan

    रविभूषण अपने समय और समाज के ज्वलन्त मसलों और सवालों से टकराते हैं, साथ ही राजनीति और प्रशासन के बीच व्याप्त भ्रष्टाचार और आपराधिक अवसरवाद पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करते हैं। 

    319.00375.00
  • Kahan Aa Gaye Hum Vote Dete-Dete? By Ravibhushan

    Kahan Aa Gaye Hum Vote Dete-Dete? By Ravibhushan

    रविभूषण अपने समय और समाज के ज्वलन्त मसलों और सवालों से टकराते हैं, साथ ही राजनीति और प्रशासन के बीच व्याप्त भ्रष्टाचार और आपराधिक अवसरवाद पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करते हैं। 

    780.00975.00
  • PRATYANGMUKH By Mukund Lath (PaperBack)

    हमारे समय में हिन्दी में दार्शनिक विचार और लेखन बहुत विरल हो गया है। जिन थोड़े से व्यक्तियों ने, फिर भी, हिन्दी में मौखिक और विचारोत्तेक दार्शनिक चिन्तन किया है, उनमें मुकुन्द लाठ का नाम अग्रणी है।

    383.00450.00
  • PRASHANIK By Mukund Lath – PaperBack

    मुकुन्द लाठ उन दुर्लभ विद्वानों में से रहे हैं जिनकी विद्वत्ता और चिन्तन के वितान में विचार, परम्परा, आधुनिकता, धर्म-चिन्तन, सौन्दर्य – शास्त्र, संगीत, ललित कला आदि सभी शामिल थे।

    340.00400.00
  • Sisriksha Ka Tatva-darshan By Mukund Lath (PaperBack)

    मुकुन्द लाठ के अलावा यशदेव शल्य ने हिन्दी में मौलिक और दार्शनिक चिन्तन किया है। इन दोनों के बीच लम्बे अरसे तक बौद्धिक साहचर्य और संवाद रहा। उनके कुछ रुझानों और वैचारिक सरोकारों में साझेदारी भी रही है।

    319.00375.00
  • PRASHANIK By Mukund Lath

    मुकुन्द लाठ उन दुर्लभ विद्वानों में से रहे हैं जिनकी विद्वत्ता और चिन्तन के वितान में विचार, परम्परा, आधुनिकता, धर्म-चिन्तन, सौन्दर्य – शास्त्र, संगीत, ललित कला आदि सभी शामिल थे।

    660.00825.00