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MOUNT EVEREST by Arun Kumar Asafal

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माउण्ट एवरेस्ट – अरुण कुमार असफल

खोज दर खोज की अनकही कहानियाँ


सन् 1856 में दुनिया की सबसे ऊँची चोटी की खोज की आधिकारिक घोषणा हुई थी। उससे पहले किसी भी भूगोलवेत्ता या वैज्ञानिक को मालूम न था कि धरती का सबसे ऊँचा स्थान हिमालय के पहाड़ों में ही है। यहाँ तक कि माउण्ट एवरेस्ट के आसपास रहने वाले स्थानीय लोग भी इस तथ्य से अनभिज्ञ थे कि जिन पहाड़ों को वे प्रतिदिन देखा करते थे उन्हीं में से एक दुनिया का सबसे ऊँचा पहाड़ था। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब इस देश की धरती से हिमालय के गगनचुम्बी शिखरों के प्रेक्षण का अभियान शुरू हुआ और प्रेक्षण के बाद गणना हुई, उसके बाद ही दुनिया की सबसे ऊँची चोटी की खोज हो पायी थी। लेकिन किस्सा यहीं खत्म नहीं हो जाता।
उच्चतम शिखर की खोज होते ही विवादों और असहमतियों का दौर आरम्भ हो गया। पहला विवाद तो उसके नाम को लेकर ही उठा था और तब यह कहा गया था कि दुनिया की सबसे ऊँची चोटी का नाम उस व्यक्ति पर रख दिया गया जिसका उस अभियान से कोई सम्बन्ध न था। यहाँ तक कि उसने उस शिखर को देखा भी न था। दूसरा विवाद उसकी ऊँचाई की गुणवत्ता को लेकर था। माउण्ट एवरेस्ट का प्रेक्षण लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी से किया गया था और इसी कारण से वैज्ञानिकगण इस प्रेक्षण की गुणवत्ता को लेकर सशंकित थे। तीसरा विवाद इसकी पहचान को लेकर उठा था। माउण्ट एवरेस्ट को शर्मीला पहाड़ माना जाता था। ऐसा मानने के पीछे कारण यह था कि यह अपने ऊँचेपन का अहसास नहीं होने देता था। इस वजह से बहुत से अन्वेषकों द्वारा इसे पहचानने में चूक हो जाती थी और वे किसी और पहाड़ को माउण्ट एवरेस्ट समझ लेते थे और उनके यात्रा विवरणों से भ्रम की स्थितियाँ बन जाती थीं। इस तरह से इस पुस्तक में माउण्ट एवरेस्ट के अन्वेषण से सम्बन्धित विविध आयामों को कथात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। रेखाचित्रों और छायाचित्रों की सहायता से पुस्तक को रोचक बनाने का प्रयास किया गया है ताकि हर आयु वर्ग के पाठकों को आसानी से सम्प्रेषित हो जाए। इस पुस्तक में माउण्ट एवरेस्ट के अन्वेषण अभियान में भारतीय गणितज्ञ राधानाथ सिकदर के योगदान का भी उल्लेख हुआ है। आम पाठकों की वैज्ञानिक चेतना के परिवर्द्धन में भी यह किताब सहायक हो सकती है।


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Description

MOUNT EVEREST by Arun Kumar Asafal


About The Author

अरुण कुमार असफल

पिछले एक दशक से शोधपरक कथेतर या नॉन फिक्शन लेखन में व्यस्त। उससे पहले तीन दशकों तक कथा लेखन करते रहे। सन् 2006 में आयी कहानियों की पहली किताब पौ फटने से पहले की कहानियों पर वरिष्ठ साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल ने टिप्पणी की थी-” लेखक के विषयवस्तु सम्बन्धी वैविध्य और अनुभव की विस्तीर्णता और उन अनुभवों को सहज कल्पनाशीलता के सहारे अपनी खास शैली में कहानी बना देने की क्षमता विस्मयजनक रूप से एक नयेपन और ताजगी का अहसास कराती है।” सन् 2008 में लेखक की एक चर्चित लम्बी कहानी पाँच का सिक्का के बारे में वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर की टिप्पणी थी- “ऐसी कहानियाँ कभी-कभी लिखी जाती हैं।”
हिन्दी कथा लेखन में ऐसी उल्लेखनीय उपस्थिति के बाद, लेखक की कथेतर लेखन में दिलचस्पी तब हुई जब 2014 में वह राष्ट्रीय सर्वेक्षण संग्रहालय के प्रभारी बने। वहाँ लेखक को क्यूरेटर की भूमिका निभाते हुए हर किसी की जिज्ञासा को शान्त करना पड़ता था जिसके लिए निरन्तर अध्ययन करते हुए अपने को अद्यतन करना होता था। वहीं से नॉन फिक्शन लेखन की ओर झुकाव हुआ। पहली किताब 78 डिग्री 2019 में आयी थी।
सम्प्रति : स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के पश्चात पूर्णकालिक लेखन।


Additional information

Author

Arun Kumar Asafal

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-018-6

Pages

312

Publication date

06-10-2026

Publisher

Setu Prakashan Samuh

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