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  • Lekin Udas Hai Prithvi – Madan Kashyap

    Lekin Udas Hai Prithvi – Madan Kashyap

    नौवाँ दशक कविता की वापसी का दशक है। ऐसा कहना न केवल इस दृष्टि से सार्थक है कि इसमें कविता फिर साहित्य के केन्द्र में स्थापित हो गयी, बल्कि इस दृष्टि से भी कि इसमें गहरी सामाजिक प्रतिबद्धता वाली कविता अपने निथरे रूप में सामने आयी और पूरे परिदृश्य पर छा गयी।

    230.00
  • Kavita Bhavita – Gyanendrapati

    Kavita Bhavita – Gyanendrapati
    कविता क्या है’ का ठीक-ठीक उत्तर न आलोचकप्रवर रामचंद्र शुक्ल ढूँढ पाये न अन्य विदग्ध जन, कोशिशें तो निरंतर की जाती रहीं-न जाने कब से। सो परिभाषाएँ तो ढेरों गढ़ी गईं, लेकिन वे अधूरी लगती रहीं। पारे को अंगुलियों से उठाना संभव न हो सका।

    430.00
  • Jeevan Ho Tum By Nishant

    Jeevan Ho Tum By Nishant

    क ऐसे कठिन समय में जब चारों तरफ सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर उथल-पुथल मची हुई हो, जब आम आदमी के हित को बहुत पीछे छोड़ सत्ता और तन्त्र के पक्ष में एक खास तरह की मानसिकता तैयार की जा रही हो, जब आम आदमी की जिंदगी को चन्द अस्मिताओं में सिमटा कर उसे वोट बैंक में तब्दील किया जा रहा हो

    245.00
  • Beech December By Shailey

    Beech December By Shailey

    260.00
  • Dabish Main – Ravindra Verma

    Dabish Main – Ravindra Verma
    दबिश में – रवीन्द्र वर्मा

    दबिश में’ प्रख्यात कथाकार रवीन्द्र वर्मा की कविताओं का पहला संग्रह है। अस्सी पार के कथाकार का यह काव्यारोहण रचनात्मक सिसृक्षा का नया द्वार खोलता है। ये कविताएँ समसामयिक जीवन के घातप्रतिघात से संघर्ष करती रचनात्मक जिजीविषा की अनिवार्य परिणति हैं। रवीन्द्र वर्मा के इस संग्रह की खूबी है कि

    210.00
  • Ganga Beeti (Gangu Teli Ki Jabani) By Gyanendrapati

    Ganga Beeti (Gangu Teli Ki Jabani)
    गंगा-बीती (गंगू तेली की ज़बानी)

    इक्कीसवीं सदी दहलीज पर थी, जब ज्ञानेन्द्रपति का कविता-संग्रह ‘गंगातट’ शाया हुआ था। तब हिंदी जगत् में उसका व्यापक स्वागत हुआ था और उसे नयी राह खोजने वाली कृति की तरह देखा-पढ़ा गया था। ‘गंगातट’ को किन्हीं ने प्रकृति और सभ्यता के द्वन्द्वस्थल के रूप में चीन्हा था, तो किन्हीं को वहाँ वैश्विक परिदृश्य में हो रहे परिवर्तनों को स्थानिकता की जमीन पर लखने का ईमानदार उद्यम दिखा था जिसमें भूमण्डलीकरण के नाम पर भूमण्डीकरण में जुटे बेलगाम साम्राज्यवादी पूँजीवाद का प्रतिरोध परिलक्षित किया जा सकता था।

    365.00
  • Tani Hui Rassi Par by Sanjay Kundan

    Tani Hui Rassi Par by Sanjay Kundan
    तनी हुई रस्सी पर – संजय कुंदन

    संजय कुंदन की कविता वर्तमान में, हमारे चारों तरफ घटित हो रहे विद्रूपों, विपर्ययों और रूपान्तरणों की बाहरी-भीतरी तहों. उनकी छिपी हई परतों में जाती है और एक ऐसा परिदृश्य तामीर करती है जिसमें हम राजनीतिक सत्ता-तन्त्रों, तानाशाह व्यवस्थाओं की क्रूरता, धूर्तता और ज्यादातर मध्यवर्गीय संवेदनहीनताओं को हलचल कर

    235.00
  • Baki Bache Kuch Log – Anil Karmele

    Baki Bache Kuch Log – Anil Karmele

    अनिल करमेले के इस संग्रह की कविताओं का स्पैक्ट्रम बड़ा है इसलिए इन्हें महज एकरेखीय ढंग से, किसी केंद्रीयता में सीमित करके नहीं देखा जा सकता। कविताओं के विषय, चिंताएँ और सरोकार व्यापक हैं, विविध हैं।

    280.00
  • Bolo Na Darvesh By Smita Sinha

    Bolo Na Darvesh By Smita Sinha
    बोलो न दरवेश – स्मिता सिन्हा

    135.00150.00
  • Chhaya Ka Samudra By Mahesh Alok

    Chhaya Ka Samudra By Mahesh Alok

    300.00
  • Ret Raag -Nand Kishore Acharya

    रेत राग – नंदकिशोर आचार्य
    Ret Raag -Nand Kishore Acharya

    100.00
  • Chhilte Huwe Apne Ko By Nand Kishore Acharya

    Chhilte Huwe Apne Ko By Nand Kishore Acharya
    ‘छीलते हुए अपने को’ – नंदकिशोर आचार्य

    220.00