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  • Kitni Kam Jagahein Hain (Poems) By Seema Singh

    साथ रहकर विलग रहने का अर्थ
    फूल बेहतर जानते हैं मनुष्यों से

    कोमलता झुक जाती है स्वभावतः
    भीतर की तरलता दिखाई नहीं देती
    निर्बाध बहती है छुपी हुई नदी की तरह
    स्पर्श की भाषा में फूल झर जाते हैं छूने से
    सच तो यह है कि वे सह नहीं पाते
    और गिर जाते हैं एक दिन
    हमें फूलों से सीखनी चाहिए विदा !
    – इसी पुस्तक से
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    212.00250.00
  • SADAK PAR MORCHA (Poems) Edited by Ramprakash Kushwaha, Rajendra Rajan

    दिल्ली बार्डर पर चले किसान मोर्चे के दौरान एक अद्भुत बात हुई। अनगिनत शहरी हिन्दुस्तानियों को पहली बार एहसास हुआ कि ‘मेरे अन्दर एक गाँव है’। जो किसान नहीं थे उन्हें महसूस हुआ कि ‘आन्दोलन सिर्फ किसानों का नहीं है। किसान सिर्फ खेत में ही नहीं हैं।’ इसकी पहली सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पंजाब में हुई। लोकगीतों और गायकों के समर्थन के सहारे यह आन्दोलन खड़ा हुआ और दिल्ली के दरवाजे पहुँचने की ताक़त जुटा सका। आन्दोलन के दौरान लोकमानस से जुड़ी इस रस्सी ने किसान मोर्चे के टेण्ट को टिकाये रखा। इस अन्तरंग रिश्ते ने आन्दोलन को वह ताक़त दी जो हमारे समय के अन्य जन आन्दोलनों- मसलन नागरिकता क़ानून विरोधी आन्दोलन या फिर मज़दूर आन्दोलन- को हासिल नहीं हो पायी। इसी बल पर किसान आन्दोलन पुलिसिया दमन, सत्ता की तिकड़म, गोदी मीडिया के दुष्प्रचार और प्रकृति की मार का मुक़ाबला कर सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर पाया।

    सड़क पर मोर्चा इस अनूठे रिश्ते का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। इसमें किसान आन्दोलन के दौरान उसके साथ खड़े हुए गीत हैं, मुक्त छन्द की कविताएँ हैं, तो दोहे और ग़ज़लें भी। यह कविताएँ हमारे दृष्टिपटल से विलुप्त होते किसान को हमारी आँख के सामने खड़ा करती हैं-‘ अनथक बेचैन हूँ। आपका और अपना चैन हूँ।
    अन्न के ढेर लगाता हुआ।’ हमारे मानस को झकझोरती हैं- ‘क्या तुम्हारे भीतर उतनी सी भी नमी नहीं बची है। जितनी बची रहती है ख़बर / इन दिनों अखबारों में।’ मीडिया की ठगनी भाषा पर कटाक्ष करती हैं- ‘ये किस तरह के किसान हैं। ये किसान हैं भी या नहीं ?’ कवि किसान को ललकारता है- ‘जो अपनी जमीन को नहीं बचा सकता/ उसे जमीन पर रहने का कोई हक़ नहीं।’ गणतन्त्र दिवस की ट्रैक्टर परेड के बाद जब पूरा निजाम किसान आन्दोलन पर पिल पड़ता है, तब कविता किसान के साथ खड़ी होती है- ‘वे बैल थे पहले / अब ट्रैक्टर हैं। वे श्रोता थे पहले / अब फ़ैक्टर हैं/ सूरज दे रहा है सलामी।’ कविता याद दिलाती है कि- ‘जवान और किसान / दोनों की जगह अब बार्डर पर है’, कि हम एकदम क़रीब से इतिहास बनते हुए देख रहे हैं और कविता पूछती है- ‘किस ओर हो तुम ?’ राज का राज़ खोलती हुई कविता हमारा आह्वान करती है- ‘इस निजाम से लड़ना आसान नहीं/ पर इससे जरूरी कोई काम नहीं।’ निराशा के इस दौर में शब्द किसान के साथ खड़ा हमें आश्वस्त करता है- ‘अन्न की तरह पकेगी सद्बुद्धि।’
    – योगेन्द्र यादव
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    213.00250.00
  • Ladki Aur Chinar Ki Prem Katha By Asiya Zahoor

    इस संग्रह की कविताओं में वह सघन संवेदना और बौद्धिक बेचैनी है, जिसके माध्यम से आसिया जहूर कई स्तरों पर दुख और दमन को देखती और महसूस करती हैं। समय का दुख, समाज का दुख, और सबसे ऊपर स्त्री का दुख। लेकिन, उनकी कविता दुखों और संघर्षों की सहज अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, वह मिथक, इतिहास, संस्कृति और लोकजीवन में गहरे प्रवेश करते हुए अपने दुख को महाकरुणा में रूपान्तरित कर देती है। वह करुणा ही है जो बुद्ध और यीशु के कई बार साधारण से लगने वाले शब्दों में भी असाधारण प्रभाव पैदा कर देती है। एक अच्छी कविता में जीवन की अभिप्रेरक अभिव्यक्ति तो होती है, लेकिन करुणा का ऐसा विस्तार दुर्लभ है। निस्सन्देह आसिया जहूर हमारे समय की एक अनोखी कवयित्री हैं। नये मिलेनियम की मेड्यूसा हैं, जो अपनी विवशता को शक्ति में बदल देती है, नये युग

    की जुलेखा, जो फ़रिश्ते जिब्राईल के सामने सौदे से इनकार कर देती है। ‘युवा लड़की और वृद्ध चिनार की प्रेम कथा’ एक अद्भुत प्रेम कविता है। चिनार कश्मीर की प्रकृति और संस्कृति का मूर्त रूप है, जो एक युवा लड़की यानी, आज के समय की जूनी अर्थात् हब्बा ख़ातून से प्रेम कर रहा है। प्रेम का यह विस्तार उसी करुणा तक पहुँचता है, जो आसिया की कविता के केन्द्र में है।
    वह समय के संकट को व्यक्त करने के लिए हर बार मिथकों या पुराकथाओं का सहारा ही नहीं लेती बल्कि, कई बार क्रूर सच से सीधे टकराती है। लेकिन, यह याद रखते हुए कि कविता अन्ततः एक कला है। मेरी दादी बुनती थी…, गहन सैन्यीकृत क्षेत्र में… और मेरी बेटी के लिए… जैसी कविताओं में अतीत, वर्तमान और भविष्य (सम्भावित) के दमन और क्रूरता की अभिव्यंजना के बीच प्रतिरोध की वह ऊँचाई है, जिसके सामने बड़ा से बड़ा अत्याचारी शासक भी बौना दीखने लगता है। यह है कविता की ताक़त !
    – मदन कश्यप
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    128.00150.00
  • Dalit Kavita – Prashana aur Paripekshya – Bajrang Bihari Tiwari

    दलित साहित्यान्दोलन के समक्ष बाहरी चुनौतियाँ तो हैं ही, आन्तरिक प्रश्न भी मौजूद हैं। तमाम दलित जाति-समुदायों के शिक्षित युवा सामने आ रहे हैं। ये अपने कुनबों के प्रथम शिक्षित लोग हैं। इनके अनुभव कम विस्फोटक, कम व्यथापूरित, कम अर्थवान नहीं हैं। इन्हें अनुकूल माहौल और उत्प्रेरक परिवेश उपलब्ध कराना समय की माँग है। वर्गीय दृष्टि से ये सम्भावनाशील रचनाकार सबसे निचले पायदान पर हैं। यह ज़िम्मेदारी नये मध्यवर्ग पर आयद होती है कि वह अपने वर्गीय हितों के अनपहचाने, अलक्षित दबावों को पहचाने और उनसे हर मुमकिन निजात पाने की कोशिश करे। ऐसा न हो कि दलित साहित्य में अभिनव स्वरों के आगमन पर वर्गीय स्वार्थ प्रतिकूल असर डालने में सफल हों।

    – इसी पुस्तक से

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    234.00275.00
  • Ishwar Ka Dukh by Shambhu Naath

    ये मुश्किल समय की कविताएँ हैं। इनमें कुछ खोते जाने की पीड़ा और नागरिक भय के साथ असहमति की आवाजें हैं। ये ताकत द्वारा निर्मित मायावी दृश्यों से परे दबाये गये सत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं। 2020-23 के बीच लिखी गयीं इन कविताओं में ‘प्रचलित’ और ‘प्रचारित’ के बाहर देखने का साहस लक्षित किया जा सकता है।

    आज जब हर तरफ शोर और वाग्जाल है, सबसे अधिक जरूरत शब्दों को बचाने की है। यह अनुभव की स्वतन्त्रता के साथ-साथ कुछ जरूरी मूल्यों को बचाना है और कृत्रिम सरहदों को लाँघना है। इस संकलन की कविताएँ वर्तमान दौर के दुख, घबराहट और निश्छल स्वप्नों में साझेदारी से जन्मी हैं। ‘हम-वे’ के उत्तेजक विभाजन के समानान्तर ये अ-पर के बोध से जुड़ी हैं। ये कविताएँ वस्तुतः सुन्दरता, स्वतन्त्रता और भाषा की नयी सम्भावनाओं की तलाश हैं।

    135.00150.00
  • Bhasha Mein Nhi By Sapna Bhatt

    सपना भट्ट की कविताओं से गुजरते हुए वाल्टर पीटर होराशियो का यह कथन कि ‘All art constantly aspires towards the condition of music’ बराबर याद आता है। समकालीन कविता में ऐसी संगीतात्मकता बिरले ही दिखाई पड़ती है। यह कविताएँ एक मद्धम सिम्फनी की तरह शुरू होती हैं, अन्तर्निहित संगीत और भाषा का सुन्दर वितान रचती हैं और संगीत की ही तरह कवि मन के अनन्त मौन में तिरोहित हो जाती हैं। पूरे काव्य में ध्वनि, चित्र, संकोच, करुणा, विनय और ठोस सच्चाइयाँ ऐसे विन्यस्त कि कुछ भी अतिरिक्त नहीं। यह कविताएँ ठण्डे पर्वतों और उपत्यकाओं के असीमित एकान्त के बीच से जैसे तैरती हुई हमारी ओर आती हैं। इन सुन्दर कविताओं में कामनाहीन प्रेम की पुकारें, रुदन, वृक्षों से झरती पत्तियाँ और इन सब कुछ पर निरन्तर गिरती बर्फ जैसे अनगिनत विम्ब ऐसे घुले मिले हैं कि चित्र और राग संगीत, एकसाथ कविताओं से पाठक के मन में कब चले आते हैं पता ही नहीं चलता। यह कविताएँ किस पल आपको अपने भीतर लेकर बदल देती हैं यह जानना लगभग असम्भव है।

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    234.00275.00
  • Samay Ka Pul By Sanjay Shandilya

    “तुमने दिया है ऐसा विस्तार कि कहीं भी महसूस किया जा सकता है मुझे
    दी है ऐसी गहराई कि कहीं तक डूबा जा सकता है मुझमें
    और ऐसी उदारता कि कुछ भी माँग लिया जा सकता है मुझसे
    तुमने दिया ही है इतना सारा- कि लगता है मैं ही आकाश हूँ समन्दर हूँ, हवा और धरती हूँ सूरज और चाँद और सितारा…
    – इसी पुस्तक से”

    213.00250.00
  • Akasmaat Ke Aagosh Mein BY Prabhat Tripathi

    “प्रभात को अपने जीवन के समापन के निकट होने की मार्मिक संवेदना है :
    काश! मैं मर सकता असम्भव अकस्मात् के आगोश में
    यह संग्रह मर्म-मानवीयता-विडम्बना के साथ- साथ नश्वरता, हमारे समय के अन्तर्विरोधों के बीच सक्रिय-मुखर जिजीविषा का दस्तावेज़ है।
    रज़ा पुस्तक माला में इसे प्रकाशित करते हुए हमें प्रसन्नता है।
    – अशोक वाजपेयी”

    169.00199.00
  • Prem Ke Paksh Mein Prarthana By Kundan Siddhartha

    कुंदन सिद्धार्थ की कविता कम शब्दों में अपने तरक़्क़ीपसन्द मन्तव्यों की स्पष्ट, मार्मिक एवं सार्थक अभिव्यक्ति है। इन कविताओं के मूल में मानवीय संवेदन और उपचार में मानवीय सरोकार हैं। कवि के इस पहले संग्रह का हिन्दी जगत् में इसलिए भी स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि ये कविताएँ वे आँखें हैं जो जितना देखती हैं उससे कहीं अधिक हैं।

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    213.00250.00
  • Isiliye Bachi Hui Hai Prithvi Ab Tak By Anup Kumar

    इस संग्रह और इससे पूर्व की कविताएँ इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं कि अनूप कुमार सूक्ष्मतम पर्यवेक्षण और जीवनधर्मी विवेक के कवि हैं। उनकी कविताओं में अभिव्यक्त राजनीतिक चेतना यह संकेतित करती है कि वे जीवन और समाज में होने वाली गतिविधियों और घटनाओं को एकांगी दृष्टि से नहीं देखते। इसीलिए उनकी कविताएँ एकरैखिक न होकर बहुस्तरीय और संश्लिष्ट हैं। वे आपको विचलित करती हुई अवाक् कर देती हैं। आप एकाएक सन्नाटे में आ जाते हैं और सामने दीखती हुई चमक के पीछे की कालिमा आपकी पुतलियों के सामने…

    213.00250.00