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CHINI DARSHAN KA SANKSHIPT ITIHAS by Fung Yu-Lan

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चीनी दर्शन का संक्षिप्त इतिहास – फङ यओ-लान

अनुवादक आनन्द स्वरूप वर्मा


चीन के बारे में बहुत सारी पुस्तकें उपलब्ध होने के बावजूद हमारे पास उस देश के दर्शन के बारे में बहुत कम प्रामाणिक जानकारी है। प्रस्तुत पुस्तक निश्चय ही ऐसी पहली पुस्तक है जिसमें सही अर्थों में कनफ्यूशियस से शुरू होकर मौजूदा दौर के दार्शनिकों को लेते हुए चीनी चिन्तन का व्यापक और सुव्यवस्थित विवरण पेश किया गया है। इसके लेखक एक चीनी विद्वान हैं जिन्हें आमतौर पर उनके देश में इस विषय का अत्यन्त योग्य व्यक्ति समझा जाता है। इस पुस्तक की खास बात यह है कि यह पुस्तक विदेशी पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गयी है और इस वजह से विषय वस्तु को प्रस्तुत करने की इसकी शैली उस शैली से भिन्न है जिसका प्रयोग चीनी पाठकों के लिए किया जाता है। यह पुस्तक चीनी विचार पद्धति की दो प्रमुख धाराओं कनफ्यूशियसवाद और ताओवाद के बारे में जानकारी तो देती ही है साथ ही यह भी बताती है कि इन दोनों विचार पद्धतियों का विकास कैसे हुआ और इतिहास के किस कालखण्ड में इनका सबसे ज्यादा प्रभाव था। ईसा पूर्व पाँचवीं से तीसरी शताब्दी के बीच परस्पर प्रतिस्पर्धी अन्य विचार पद्धतियों में से ये महज दो थीं जो टिकी रह सकीं। उस अवधि के दौरान इतने सारे मतों का अस्तित्व था कि चीनी लोगों ने इसका उल्लेख ‘सौ विचार शाखाओं’ के रूप में किया है। चीन में दार्शनिक विचारधारा का विकास निजी तौर पर अध्यापन के जरिये हुआ। चीन के इतिहास में कनफ्यूशियस पहले ऐसे शिक्षक थे जिनके छात्रों की संख्या हजारों में थी और उनमें से कई सौ प्रसिद्ध विचारक और विद्वान बने। भारतीय पाठकों के लिए यह पुस्तक इसलिए भी बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बताया गया है कि कैसे चीन में बौद्ध धर्म की शुरुआत इतिहास की महानतम घटनाओं में से एक थी और कैसे इसने खासतौर पर धर्म, दर्शन, कला और साहित्य को प्रभावित किया। हिन्दी के पाठकों के लिए चीनी दर्शन की विकास यात्रा को समझने में यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण योगदान कर सकती है।

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Description

CHINI DARSHAN KA SANKSHIPT ITIHAS
by Fung Yu-Lan (Translated by Anand Swaroop Verma)

फङ यओ-लान

फङ यओ-लान का जन्म चीन के हेनान प्रान्त के हेटांग काउण्टी में साल 1895 में हुआ। वे आधुनिक चीनी दर्शन के एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उन्हें दर्शन के क्षेत्र में गहन अन्तर्दृष्टि और बौद्धिक योगदान के लिए जाना जाता है। उनकी शिक्षा-दीक्षा पारम्परिक तौर पर चीन में ही हुई, लेकिन अमेरिका में अध्ययन के दौरान फङके बौद्धिक दायरे का काफी विस्तार हुआ। वहीं पर उन्होंने पश्चिमी दर्शन को जाना समझा। चीन लौटने के बाद उन्होंने पेकिंग और शिंधुआ विश्वविद्यालयों में अहम जिम्मेदारियाँ सँभालीं। जापान-विरोधी युद्ध के उथल- पुथल भरे दौर के बीच दार्शनिक जगत में उन्होंने काफी योगदान दिया। चीनी दार्शनिक इतिहास पर उन्होंने तीन प्रभावशाली किताबें लिखी हैं, जो उनका बेहद मौलिक काम है-‘ए हिस्ट्री ऑफ चाइनीज फिलॉसफी’, ‘ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ चाइनीज फिलॉसफी’ और ‘ए न्यू हिस्ट्री ऑफ चाइनीज फिलॉसफी’। इन किताबों ने चीन के अन्दर और पूरी दुनिया में चीनी विचार और दर्शन के अध्ययन को एक नया मकाम दिया। इसके अलावा, आधुनिक चीनी दर्शन पर ‘न्यू कनफ्यूशियनिज्म’ और ‘ऑन न्यू थिंग्स’ जैसी छह खण्डों में लिखी गयी किताबों के जरिये अपने दौर में उन्होंने दार्शनिक के तौर पर अपनी प्रतिष्ठा में काफी इजाफा किया। पूर्वी और पश्चिमी दार्शनिक परम्पराओं को जोड़ने की फङ की अनूठी काबिलियत ने उन्हें पश्चिमी अकादमिक जगत में पहले कद्दावर आधुनिक चीनी दार्शनिक के रूप में पहचान दिलायी। ‘ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ चाइनीज फिलॉस- फी’ उनका एक महत्त्वपूर्ण काम है, जो मूल रूप से 1948 में अँग्रेजी में प्रकाशित हुआ। यह चीनी दार्शनिक विचार के विकास पर सुस्पष्ट और गहन दृष्टिकोण पेश करता है और आज भी स्कॉलर और छात्रों के लिए यह बेहद महत्त्वपूर्ण पाठ बना हुआ है। फङ का निधन 1990 में हुआ।


आनन्द स्वरूप वर्मा

आनन्द स्वरूप वर्मा पेशे से लेखक-पत्रकार। 1966 से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में काम किया। 1970-74 तक आकाशवाणी दिल्ली के हिन्दी समाचार विभाग से सम्बद्ध रहे। 1970 से 1975 तक साप्ताहिक ‘दिनमान’ में नियमित लेखन किया। जनपक्षीय पत्रकारिता और वैकल्पिक मीडिया विकसित करने के उद्देश्य से 1980 में ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ का सम्पादन-प्रकाशन शुरू किया। 1994 में दक्षिण अफ्रीका के प्रथम जनतान्त्रिक चुनाव की दैनिक ‘जनसत्ता’ में रिपोर्टिंग की। लगभग पाँच वर्षों तक ‘जनसत्ता’ में समाचार-विचार नाम से मीडिया पर एक साप्ताहिक कॉलम लिखा। 1990 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में दिल्ली यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (डीयूडब्ल्यूजे) के अध्यक्ष रहे। अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का सम्पादन व अनुवाद किया : आज का भारत (रजनी पामदत्त), भारत का स्वाधीनता संग्राम (ई.एम.एस. नम्बूदिरिपाद), भारतीय जेलों में पाँच साल (मेरी टायलर), प्राचीन भारत में राजनीतिक हिंसा (उपिंदर सिंह), माओ त्सेतुङ का राजनीतिक दर्शन (मनोरंजन मोहन्ती), औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति (न्गुगी वा थ्योंगों), तीसरी फसल (पी. साईनाथ), भारत में बंधुआ मजदूर (महाश्वेता देवी), तानाशाह की कैद में (केन सारो-वीवा), लाल पोस्ते के फूल (अलाए), हिंसा (फेस्टस इयायी), अमिल्कर कबराल जीवन-संघर्ष और विचार आदि एवं पत्रकारिता का अन्धा युग पुस्तक का लेखन।

Additional information

Author

Fung Yu-Lan

Translation

Anand Swaroop Verma

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-934-9

Pages

534

Publication date

14-01-2025

Publisher

Setu Prakashan Samuh

1 review for CHINI DARSHAN KA SANKSHIPT ITIHAS by Fung Yu-Lan

  1. Amit Pandey

    चीनी दर्शन का संक्षिप्त इतिहास, यह पुस्तक फङ याओ लान द्वारा लिखित है और यह चीन के दार्शनिक परंपराओं और विचारधाराओं का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक विशेष रूप से महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह कनफ्यूशियस से लेकर आधुनिक काल तक के दार्शनिक चिंतन को क्रमबद्ध और सुगठित रूप में प्रस्तुत करती है।
    इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका अनुवाद आनंद स्वरूप वर्मा ने बेहद सरल भाषा में किया है। आनंद जी खुद एक लेखक हैं और दक्षिण एशिया के बारे में खासतौर से चीन और नेपाल पर गहरी पकड़ रखते हैं। इसलिए इस पुस्तक की शैली पारंपरिक चीनी ग्रंथों से भिन्न है। यह पुस्तक दो प्रमुख विचारधाराओं, कनफ्यूशियसवाद और ताओवाद पर गहन दृष्टि डालती है और इनकी ऐतिहासिक यात्रा को दर्शाती है। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि ईसा पूर्व पाँचवीं से तीसरी शताब्दी के दौरान इन विचारधाराओं ने अन्य प्रतिस्पर्धी विचारों के बीच अपनी स्थायी पहचान बनाई।
    पुस्तक चीनी दर्शन की आत्मा, इसके ऐतिहासिक संदर्भ, विभिन्न दार्शनिक शाखाओं के विकास और उनके प्रभावों की विवेचना करती है। इसमें प्रमुख दार्शनिकों जैसे कि कनफ्यूशियस, लाओ-त्स, आदि के विचारों को विशद रूप में प्रस्तुत किया गया है। साथ ही, यह बताती है कि चीन में बौद्ध धर्म का आगमन और उसका प्रभाव किस प्रकार हुआ।
    इस ग्रंथ का महत्व भारतीय पाठकों के लिए भी उल्लेखनीय है, क्योंकि यह बौद्ध धर्म के प्रभाव और चीनी समाज में इसके समावेश को दर्शाती है।
    लेखक की गहन शोधपरक दृष्टि और विषय की व्यापकता इस पुस्तक को एक अनिवार्य ग्रंथ बनाती है। यह न केवल दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है, बल्कि उन सभी के लिए भी रोचक है जो चीनी संस्कृति और उसके दार्शनिक इतिहास को समझना चाहते हैं। मुझे याद नहीं पर इतने विस्तार से चीन के दर्शन पर हिन्दी में आई यह पहली किताब है। जिसे अध्यापकों और शोधार्थियों को ज़रूर पढ़ना और समझना चाहिए।

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