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GHERABANDI Aur ANYA KAVITAYIN (Poems) by Sanjay Kundan

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घेराबन्दी और अन्य कविताएँ – संजय कुंदन


संजय कुंदन की इन कविताओं का पहला पाठ उस सादगी, सरलता और स्पष्टता के लिए किया जा सकता है जिससे उनकी दृष्टि निर्मित है। और यह दृष्टि विचार संपन्न है इसलिए वह ‘कमजोर की ताक़त’ के साथ-साथ उन परिस्थितियों को भी चिह्नित करती है जिसमें संवेदनशीलता और मनुष्यता को इस दुनिया में बीमारियों की तरह देखा जाने लगा है। वे कवि-नागरिक की तरह सोचते हुए, अपने एकदम क़रीब की घटनाओं पर ध्यानाकर्षण करते हैं और बताते चलते हैं कि इनका एक वैश्विक अर्थ है। इस तरह ये एक ‘डिस्कोर्स’ रचती हैं। कई बार ‘कॉमिकल’ होकर भी।
फिर देख सकते हैं कि संजय कुंदन हमारे समय में बढ़ती नृशंसताओं, घेराबन्दियों, यातनाओं, विडम्बनाओं, राजनीतिक दुरभिसन्धियों के विरल कवि हैं। समाज में समरसता और प्रेमिलता की आग्रही ये कविताएँ जैसे रनिंग कमेंट्री हैं। आँखों देखा हाल। लेकिन इतना ही नहीं, नेपथ्य में चल रही प्रक्रियाओं का विश्लेषण इन कविताओं में शरीक है, अस्तु ये चेतावनी देने और आत्मावलोकन का कार्यभार उठाती हैं। ये आशंकाओं, भय, संकटों में संघर्ष से भी निर्मित हुई हैं लेकिन मामूली इच्छाओं, कामनाओं और आशाओं को विस्मृत नहीं कर देतीं। वे जनव्यथाओं की जड़ें जनविरोधी राजनीति में देख सकती हैं। सामाजिक, पारिवारिक तौर पर भी संजय चौकन्ने जासूस, सजग व्यक्ति की तरह मुस्तैद रहते हैं। इसी वजह से पिता पर लिखी कविता में वे परम्परावादी विचार से पृथक होकर सोच सकते हैं।  विकास और सभ्यता की ओट में पनप रही बर्बरताओं को संजय कुंदन अपनी कविता से समक्ष करते हैं। नेहरू, बुलडोजर, दंगाई, घुसपैठिया, हत्यारे, फ़ासीवाद, उत्सव, किसान आन्दोलन, जैसी संज्ञाओं, विशेषणों, क्रियाओं और सन्दर्भों के ज़रिये वे अपने बदलते देश की नये सिरे से शिनाख़्त करते हैं। सिन्दूरी को सिन्दूरी, लाल को लाल और नीले को नीला ही कहते हैं। जैसे ये ग्राउण्ड जीरो से भेजे गये, संवेदित ‘डिस्पैच’ हैं। सच्चे, मूल्यवान और ख़तरे उठाकर लिखे गये। ‘फ़रीद से मुलाक़ात’ जैसी कविताएँ नागरिकों के उस मनोविज्ञान तक जाती हैं जो लम्बी साम्प्रदायिक राजनीति से प्रसूत है। संजय व्यंजना से कहीं अधिक अभिधा में बात करते हैं और अभिधा की ताक़त का अहसास कराते हैं। उनका दो टूक हो जाना, इस समय में सीधे हस्तक्षेप की आकांक्षा है। विलक्षणता है कि कवि के अकेलेपन, असहायता और क्रोध को वे अपने जन से जोड़ लेते हैं और उनके निस्तार की योजना बताते हैं।
– कुमार अम्बुज


 

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Description

GHERABANDI Aur ANYA KAVITAYIN (Poems) by Sanjay Kundan


About The Author

संजय कुंदन

जन्म : 7 दिसम्बर 1969, पटना।
शिक्षा : पटना विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एमए।
सम्प्रति : वाम प्रकाशन, नयी दिल्ली में सम्पादक ।
कृतियाँ : काग़ज़ के प्रदेश में, चुप्पी का शोर, योजनाओं का शहर, तनी हुई रस्सी पर (कविता संग्रह); बॉस की पार्टी, श्यामलाल का अकेलापन (कहानी संग्रह); टूटने के बाद, तीन ताल (उपन्यास); जीरो माइल पटना (संस्मरण); नेहरू: द स्टेट्समैन (नाटक); कुछ लघु और नुक्कड़ नाटकों का भी लेखन।
अनेक नाटकों में अभिनय और निर्देशन। लघु फ़िल्म ‘इट्स डिवेलपमेण्ट स्टुपिड’ की पटकथा का लेखन।
सम्पादन : गहन है यह अन्धकारा, कँटीले तार की तरह (कविता संकलन); कितने यातना शिविर (कहानी संकलन); कुछ और अलगू, कुछ और जुम्मन (प्रेमचन्द की साम्प्रदायिकता विरोधी कहानियाँ) ।
अनुवाद : आवर हिस्ट्री, देयर हिस्ट्री, हूज हिस्ट्री (रोमिला थापर), एनिमल फार्म (जॉर्ज ऑरवेल), लेटर्स ऑन सेज़ां (रिल्के), पैशन इण्डिया (जेवियर मोरो) और वॉशिंगटन बुलेट्स (विजय प्रसाद) का हिन्दी में अनुवाद।
सम्मान : भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार; हेमन्त स्मृति सम्मान; विद्यापति पुरस्कार; बनारसी प्रसाद भोजपुरी पुरस्कार।


संजय कुंदन

Additional information

Author

Sanjay Kundan

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-038-4

Pages

141

Publication date

10-01-2026

Publisher

Setu Prakashan Samuh

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