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Buddhacharita Aur Mahakavi Ashwaghosh By Chandrabhushan

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बुद्धचरित और महाकवि अश्वघोष – चंद्रभूषण


जिसे अश्वघोष के ‘बुद्धचरितम्’ के आरम्भिक चौदह सर्गों के मूल संस्कृत पाठ में उलझे बिना उसकी अन्तर्वस्तु का आस्वादन उसी के जैसी प्रसन्न-गम्भीर शैली में करना हो उसे चंद्रभूषण की यह किताब पढ़कर सन्तोष होगा। इसमें बुद्धचरितम् के अट्ठाईस सर्गों में विन्यस्त बुद्ध की जीवनकथा के साथ-साथ उनके सन्देश का समूचा रोचक आख्यान तो है ही, प्रत्येक सर्ग के प्रारम्भ में प्रवेशिका या परिचायिका के बतौर उस सर्ग के कथा-सार के अलावा उससे सम्बद्ध प्रश्नों की विवेचना भी है। प्रारम्भिक चौदह सर्गों तक बीच-बीच में कुछ श्लोक भी उद्धृत हैं जो खासतौर से गौरतलब हैं। बाद के चौदह सर्गों में- जिनका मूल संस्कृत पाठ लुप्त है और केवल उनके चीनी-तिब्बती अनुवादों पर ही निर्भर करना पड़ता है- आवश्यकता अनुसार चीनी अनुवाद का स्पर्श कराया है। यह किताब बुद्धचरित की समग्र अन्तर्वस्तु का परिदर्शन तो कराती ही है, यथास्थान उसकी सृजनात्मक समीक्षा में भी पाठक को शरीक कर लेती है। जिसे अश्वघोष की जीवनी और उनकी रचनाओं के साथ-साथ बुद्धचरित के मूल पाठ और उसके चीनी-तिब्बती-फ्रांसीसी-जर्मन अनुवाद परम्परा की लम्बी और कष्टसाध्य खोज की गहन और अकादमिक चर्चा में सुख मिलता हो उसे इस किताब की भूमिका जरूर पढ़नी चाहिए। आप चंद्रभूषण की कुछ मान्यताओं से असहमत हो सकते हैं लेकिन उनकी ज्ञान-निष्ठा (या बुद्ध-निष्ठा), गहरी लगन, कठोर पक्षधरता, अपार धीरज और सर-तोड़ परिश्रम की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकते।
अवधेश प्रधान, लेखक
संस्कृति चिन्तक, प्रोफेसर (रि.) बीएचयू


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Description

Buddhacharita Aur Mahakavi Ashwaghosh By Chandrabhushan


महाकवि अश्वघोष विरचित बुद्धचरित संस्कृत का एक बहुत पुराना काव्य-ग्रन्थ है। कितना पुराना, इसका अन्दाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि चीनी भाषा में इसका अनुवाद अब से 1600 साल पहले, सन् 421 ई. में हो चुका था। रचना को पल भर के लिए एक तरफ रखकर रचयिता पर आएँ तो चीनी भाषा में अश्वघोष की जीवनी भी इसी समय आ गयी थी। सौ साल बाद, छठी सदी ईसवी के प्रारम्भ में भिक्षु-आचार्य हुई च्याओ ने महाग्रन्थ काओसेंग इवान (महान् भिक्षुओं का जीवन) में इसे संकलित किया था। यह ग्रन्थ आज भी सुरक्षित है और दुनिया भर में पढ़ा जाता है।
बुद्धचरित के चीनी अनुवाद का समय वही था जब भारत में गुप्त साम्राज्य अपने शीर्ष पर था। पुराने बौद्ध विद्या संस्थान नालन्दा महाविहार को उसके द्वारा विश्वविद्यालय का रूप दिया जा रहा था और उसकी राज्यभाषा संस्कृत के काव्यसंसार में कवि-कुलगुरु कालिदास की तूती बोल रही थी। अश्वघोष भी शत-प्रतिशत संस्कृत भाषा के ही कवि हैं और उनका समय कुषाणवंशी शासक कनिष्क से जोड़कर कालिदास से ढाई-तीन सौ साल पहले का आँका गया है।

भूमिका से




			

Additional information

Author

ChandraBhushan

Binding

Paperback

Language

Hindi

Pages

326

Publisher

Setu Prakashan Samuh

3 reviews for Buddhacharita Aur Mahakavi Ashwaghosh By Chandrabhushan

  1. Aarti Kumari

    चंद्रभूषण की किताब ‘बुद्धचरितम्’ का रोचक, गहन और विद्वतापूर्ण पुनर्पाठ है, जो जीवनकथा और सृजनात्मक विवेचना दोनों प्रस्तुत करती है।

  2. Vivek Singh

    यह पुस्तक बौद्ध धर्म के बारे में अद्भुत जानकारियों से भरी है.

  3. dharmendra tripathi

    चंद्रभूषण जी ने फिर एक सार्थक पुस्तक को हम सबको को पढ़ने का अवसर दिया है, बहुत अच्छी पुस्तक लगी।

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