Description
Vaishvikaran, Asmitavad Aur Hindi Sahitya (Criticism) by Ravikant
कार्ल मार्क्स के अनुसार बदलते समाज के साथ साहित्य भी बदलता है। सामाजिक संरचना और जीवन मूल्यों के बदलने पर साहित्य की अन्तर्वस्तु और उसका स्वरूप भी बदलता है। 1990 का दशक भारतीय समाज में बड़े परिवर्तन का साक्षी बना। इस दौर में तीन बड़ी सामाजिक परिघटनाएँ सामने आती हैं। एक ओर, आर्थिक उदारीकरण ने वैश्वीकरण के लिए दरवाजे खोले। दूसरी ओर, हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक राजनीति ने सदियों के ऐतिहासिक हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों को दूषित किया। तीसरी बड़ी परिघटना हाशिये के साहित्यिक विमर्श की है। इस दौर में बढ़ती चेतना के साथ स्त्रियों और दलितों ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की।… इस पुस्तक में पिछले करीब एक दशक में लिखे गये लेख शामिल हैं। इसके अधिकांश लेख समयान्तर, वागर्थ, वसुधा और कथाक्रम जैसी पत्रिकाओं में पूर्व प्रकाशित हैं। इसलिए इनमें विषयों की विविधता है। लेकिन हमारे समय के प्रश्न और चुनौतियों को इन लेखों में देखा जा सकता है।
– भूमिका से






























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