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AYACHI KI KHOJ MEIN (Novel) by Bibhutibhushan Mukhopadhyaya

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अयाची की खोज में – बिभूतिभूषण मुखोपाध्याय

– अनुवाद मृत्युंजय


‘अजाचीर संधान’ (अयाची की खोज में) बिभूतिभूषण मुखोपाध्याय की ऐसी महत्त्वपूर्ण कृति है, जिसमें अयाची मिश्र की कथा के माध्यम से मिथिला की ज्ञान-साधना, उसकी नैतिक ऊँचाइयों और बौद्धिक गरिमा का अत्यन्त सजीव एवं मार्मिक रूप उद्घाटित हुआ है। लेखक ने एक शिक्षक के आत्मसम्मान, सरस्वती-साधना के प्रति उसके अविचल समर्पण, ज्ञानदान की नैतिकता के प्रति उसकी अडिग निष्ठा तथा मिथिला की विशिष्ट दार्शनिक परम्परा को बड़ी संवेदनशीलता और कलात्मक सन्तुलन के साथ एक सूत्र में बाँधा है।
किसी भी दर्शन को उसके वास्तविक अर्थ में समझने के लिए उसके सिद्धान्तों की जानकारी भर पर्याप्त नहीं होती; उसके जीवन-अभ्यास, साधना-परम्परा और उस सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को समझना भी उतना ही आवश्यक है, जिसमें वह दर्शन अपनी वास्तविक जीवन्तता प्राप्त करता है। इस दृष्टि से यह कृति केवल एक कथात्मक आख्यान नहीं, बल्कि न्यायदर्शन की एक विलक्षण विभूति के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परम्परा के मूर्त जीवन-संसार तक पहुँचने का सशक्त सेतु भी है।
‘अयाची के गाँव’ पर शोध के दौरान मुझे अयाची मिश्र के जीवन-चरित्र और न्यायदर्शन में उनके अप्रतिम अवदान को निकट से जानने का अवसर मिला था। उस समय न तो यह पुस्तक सुलभ थी और न ही मुझे बांग्ला का पर्याप्त ज्ञान था। ऐसे में मृत्युंजय जी का यह सधा हुआ, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अनुवाद रेखांकित किये जाने योग्य है। निस्सन्देह, इस अनुवाद के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परम्परा पर कार्य कर रहे हिन्दी और मैथिलीभाषी शोधकर्ताओं को न केवल नयी और मूल्यवान सामग्री उपलब्ध होगी, बल्कि मिथिला के एक समृद्ध बौद्धिक लोक तक उनकी पहुँच भी अधिक सहज, व्यापक और सार्थक बन सकेगी।
– मणीन्द्र नाथ ठाकुर

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Description

AYACHI KI KHOJ MEIN (Novel) by Bibhutibhushan Mukhopadhyaya
Translated by Mritunjay


About The Author

बिभूतिभूषण मुखोपाध्याय
जन्म : 24 अक्टूबर सन् 1894, दरभंगा जिले के पण्डौल गाँव में। निधन : दरभंगा में 30 जुलाई सन् 1987 को।
आदि निवास : हुगली जिले के चतरा में। दरभंगा राज स्कूल से मैट्रिक, रिपन कॉलेज से आई.ए. और पटना के बी.एन. कॉलेज से बी.ए.। कर्म-जीवन (1916-42) में विभिन्न स्कूलों में अध्यापन, धनी परिवारों में गृह-शिक्षक, दरभंगा महाराज के निजी सचिव, राज प्रेस और ‘इण्डियन नेशन’ पत्रिका के प्रबन्धक रहे। 1364 बंगाब्द में सुरेशचन्द्र स्मृति पुरस्कार, कलकत्ता विश्वविद्यालय का शरत् स्मृति पुरस्कार (1957), जगत्तारिणी पदक (1976), ‘डी. एल. राय रीडरशिप’ व्याख्याता (1975), 1972 में रवीन्द्र पुरस्कार, विश्वभारती का ‘देशिकोत्तम’ (1987), बर्धमान विश्वविद्यालय से डी.लिट. (1986)। इसके अतिरिक्त बंगीय साहित्य परिषद् और अन्य संस्थाओं से अनेक पुरस्कार प्राप्त।


मृत्युंजय
बिहार के रोहतास जिले के सोनबरसा ग्राम में जन्मे मृत्युंजय कुमार सिंह समकालीन भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक कूटनीति के एक विशिष्ट हस्ताक्षर हैं। कवि, लेखक, गीतकार, नाटककार, लोकगायक और 1987 बैच के पश्चिम बंगाल कैडर के सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी के रूप में उनका व्यक्तित्व प्रशासन, साहित्य, संगीत और अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संवाद के समन्वय का उदाहरण है।
भारतीय दूतावास, जकार्ता में काउंसलर (संस्कृति) रहते हुए उन्होंने 2009-10 के ‘फेस्टिवल ऑफ इण्डिया इन इण्डोनेशिया’ का सफल क्यूरेशन किया और भारत-इण्डोनेशिया के बीच स्थायी सांस्कृतिक सेतु निर्मित किया। उनकी लिखित नृत्य-नाट्य कृतियाँ ‘शिखण्डिनी’ और ‘सागरिका’ भारतीय शास्त्रीय परम्परा तथा जावा-बाली नृत्य-संवेदना के अभिनव संगम के लिए विशेष रूप से चर्चित रहीं। एक गीतकार के रूप में उनके गीत ऋतुपर्णो घोष की उल्लेखनीय फिल्मों’ चोखेर बाली’ और ‘अन्तर्महल’ सहित अनेक चर्चित फिल्मों में प्रयुक्त हुए हैं। ICCR द्वारा अनुमोदित भोजपुरी लोकगायक के रूप में उन्होंने मॉरीशस, गुयाना सहित अनेक देशों में भारतीय लोकधारा को स्वर दिया है।
भोजपुरी उपन्यास ‘गंगा रतन बिदेसी’ और खण्डकाव्य ‘द्रौपदी’ उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं। सम्प्रति वे KIFALC (कोलकाता इण्टरनेशनल फाउण्डेशन फॉर आर्ट, लिटरेचर एण्ड कल्चर) और ‘यापनचित्र’ के न्यासी के रूप में कला, साहित्य और संस्कृति के वैश्विक संवाद को नयी दिशाएँ दे रहे हैं।


AYACHI KI KHOJ MEIN (Novel) by Bibhutibhushan Mukhopadhyaya

Additional information

Author

Bibhutibhushan Mukhopadhyaya

Translator

Mritunjay

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-426-9

Pages

184

Publication date

21-09-2026

Publisher

Setu Prakashan Samuh

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