JAHANAARA : PADSHAH BEGUM by Rajeev Kumar
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जहाँआरा पादशाह बेग़म — राजीव कुमार
‘जहाँआरा : पादशाह बेग़म’ के किरदार के इर्दगिर्द में बुना गया यह उपन्यास यह तथ्य रेखांकित करता है कि नये सिरे से इतिहास के आख्यान बनने का सफर ‘रिक्त स्थानों की पूर्ति’ का बुद्धि विलास भर नहीं होता, यह परकाया प्रवेश और अहंशून्यता की लीला होता है। जिसे कीट्स अपने ढंग से नेगेटिव केपेबिलिटी कहते थे। इतिहास के रोल-कॉल में जिनका नाम भर पुकारा गया, उसका एक धड़कता हुआ सा किरदार भर देना इतना आसान नहीं होता, खासकर जब वह एक स्त्री चरित्र हो। महल से दरगाह, दरगाह से मकबरे तक के सफर में ही जिसने जेहनी तौर पर ये दुनिया और वो दुनिया दोनों ही इस तरह मापी हो जिस तरह गणेश ने माता-पिता की परिक्रमा में मापी थी। ‘फूल डाली से गूँथा ही झड़ गया, घूम आयी गन्ध पर संसार में।’ इस स्वयं समर्थ गन्ध के विस्तार में एक भूमिका निभाएगा यह उपन्यास; खासकर उन संवादों में जो जहाँआरा मुगल सल्तनत के कठिन मोड़ों पर स्वयं से करती है तथा पिता से अलग। अलग ढंग से चार भाइयों से, परितप्त पिता से और सबसे ज्यादा तो अपनी बाँदियों से, खिदमतगार हिजड़ों से जिन्हें जासूसों की तरह हरम में रखा जाता था । इन्हीं में एक हैं मौला बख्श जिनके बारे में कहा गया है कि वे चलते-फिरते खजाना थे-इतिहास, तहजीब, समाज और जंग का पूरा इल्म उनकी यादों में महफूज़ था। दरबार के उमराओं की साजिशें, सल्तनत की नब्ज तक सब कुछ उनकी आँखों ने देखा था। वे जहाँगीर के उस्ताद और रहबर हैं। उन्हीं से गपशप जो होती है उससे इतिहास एक नयी किताब सा खुलने लगता है, पाठक के सामने। यह लेखनीय युक्ति बहुत काम की है। चूँकि दोनों का मिजाज सूफियाना है। गाढ़ी उर्दू युक्तियाँ हरसिंगार सी झड़ती रहती हैं पूरे पाठ में और ज्ञान संज्ञान में कैसे बदलता है, इसका आभास भी होता चलता है। सल्तनत बुलन्दियों पर बैठी दो हस्तियों की सादगी देख रही थी : ‘एक शिकस्ता अपने जेहन में, एक चौकस और खामोश अपने हासिल में।’ हिन्दी भी मुगल शासक जहाँआरा की तरह हर परिवेश आत्मसात करने की जो अकूत क्षमता रखती है, सबसे प्यार करने, सबसे घुल-मिलकर बतियाने का जिगरा रखती है उसकी एक खूबसूरत मिसाल है यह उपन्यास। हिन्दी में चार किस्म के शब्द-कोश उसके चार लिबास हैं तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज और चूँकि आधुनिकता के गर्भ से जन्मी स्वाधीनता संग्राम की भाषा है; कोई इसकी खातिर पराया है ही नहीं। वह जितनी आसानी से सांस्कृतिक हो सकती है उतनी ही आसानी से फारसी। यह लचीलापन, यह सादगी उसकी जहाँआरा वाली ही है। वैसे यह आपको उपन्यास पढ़कर ही समझ में आएगा ।
— अनामिका
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