Description
Aangan By Khadeeja Mastoor – Hindi Translation By Khursheed Alam
देश विभाजन एक ऐसी त्रासदी है जिसे एक लम्बा अरसा गुजर जाने के बाद भी भुलाया नहीं जा सका है। यह इतनी भयानक त्रासदी थी कि देश का हर व्यक्ति उससे मानसिक रूप से प्रभावित हुआ। ख़दीजा मस्तूर ने विस्तार से उसका विवरण नहीं दिया लेकिन उसके प्रभावों का उल्लेख किया है। उस इंकलाब के तुरन्त बाद जिस समाज ने जन्म लिया था वह इतिहास में बहुत अहम है, लोगों के जेहनों में भी इंकलाब आ गया था। इस उपन्यास में सियासत का भी जिक्र है लेकिन यह उल्लेख कहीं भी रूखा-फीका नहीं होने पाया है। बड़े चचा पक्के काँग्रेसी हैं, दिन-रात उनके यहाँ जलसे होते हैं। छम्मी मात्र बड़े चचा की जिद पर मुस्लिम लीगी कहलाती है, नारे लगाती है और मोहल्ले के बच्चों को एकत्र करके हर वृहस्पतिवार को बताशे बाँटती है। बड़े चचा सन् 1947 के उपद्रव में जबकि जवाहरलाल नेहरू से मिलने जा रहे होते हैं, शहीद कर दिये जाते हैं। ख़दीजा मस्तूर बड़ी कुशलता से जिंदगी की पेचीदगियों को रेखांकित करती हैं। साधारण घटनाओं के द्वारा असाधारण घटनाओं तक पहुँचने में उन्हें कमाल हासिल है। वह किसी साहित्यिक आन्दोलन से सम्बद्ध नहीं थीं।
उर्दू के प्रसिद्ध आलोचक उस्लूब अहमद अंसारी इस उपन्यास की गिनती उर्दू के 15 श्रेष्ठ उपन्यासों में करते हैं जबकि शम्सुर्रहमान फ़ारूकी का कहना है कि इस नॉवेल पर अब तक जितनी तवज्जो दी गयी है वो इससे ज्यादा का मुस्तहिक़ है। भारत विभाजन के विषय पर यह बहुत ही सन्तुलित उपन्यास अपनी मिसाल आप है।
About the Author:
ख़दीजा मस्तूर 11 दिसम्बर 1927 को उत्तर प्रदेश के जिला बरेली में पैदा हुईं। घर का माहौल अदबी था। माँ की देखा-देखी ख़दीजा मस्तूर और उनकी छोटी बहन हाजिरा मसरूर को भी कम उम्र से ही कहानियाँ लिखने का शौक़ पैदा हुआ। उनकी कहानियाँ उस वक़्त की बच्चों की पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं जिससे उनकी हौसला अफ़ज़ाई हुई। फिर जब वह बड़ी हुईं और उनकी कहानियाँ प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं ‘साक़ी’, ‘अदबी दुनिया’ और ‘आलमगीर’ में प्रकाशित हुईं तो अदब में उनकी पहचान बन गयी। ख़दीजा मस्तूर के पिता का देहान्त उसी वक़्त हो गया था जब दोनों बहनें कमसिन थीं, इसलिए घर में आर्थिक तंगी थी। वह कुछ समय के लिए बम्बई में रहीं फिर जब पाकिस्तान बना तो वह अत्यधिक अव्यवस्था की स्थिति में पाकिस्तान चली गयीं, जहाँ मशहूर अदीब व शायर अहमद नदीम क़ासमी ने उनकी मदद की। सन् 1950 में उन्होंने क़ासमी के भांजे, पेशे से पत्रकार जहीर बाबर ऐवान से शादी कर ली। ख़दीजा सारी उम्र साहित्य सेवा करती रहीं। 26 जुलाई 1982 को लन्दन में दिल का दौरा पड़ने से उनका इन्तिकाल हो गया और वह लाहौर में दफ़न की गयीं।
ख़दीजा मस्तूर के अफ़सानों के पाँच संग्रह ‘खेल’, ‘बौछार’, ‘चन्द रोज और’, ‘थके-हारे’ और ‘ठण्डा मीठा पानी’ प्रकाशित हुए लेकिन उनको विशेष प्रसिद्धि उनके उपन्यास’ आँगन’ से मिली जिसकी गिनती उर्दू के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में की जाती है। 1962 में खदीजा मस्तूर को इस उपन्यास के लिए पाकिस्तान के प्रतिष्ठित ‘आदम जी’ अवार्ड से नवाजा गया।
डॉ. खुर्शीद आलम
उर्दू साहित्य में एम.ए., पी-एच.डी. हैं। उर्दू में कहानियाँ लिखते हैं। पैंतीस से अधिक पुस्तकों के लेखक, सम्पादक एवं अनुवादक। आपकी कई कहानियों का हिन्दी के अतिरिक्त मराठी, गुजराती, तमिल, कन्नड़ और अँग्रेज़ी में अनुवाद प्रकाशित हुआ है। हिन्दी और उर्दू को अनुवाद के माध्यम से जोड़ने में सक्रियता से संलग्न। डॉ. आलम हिन्दी साहित्य की सेवा के लिए ‘हिन्दीतर भाषी लेखक पुरस्कार’ से सम्मानित हैं। आप उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी, लखनऊ द्वारा पुरस्कृत हैं, साथ ही उर्दू साहित्य की सेवा के लिए ऑल इण्डिया मीर एकेडमी, लखनऊ द्वारा ‘इम्तियाज़-ए-मीर’ से भी सम्मानित हैं।

































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