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JINKE SAATH JIYA MEIN (Memoirs) by Vibhuti Narayan Rai

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जिनके साथ जिया मैं – विभूति नारायण राय


‘जिनके साथ जिया मैं’ वरिष्ठ लेखक, एक्टिविस्ट और महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति विभूति नारायण राय के संस्मरणों की किताब है, जो कि नाम से भी ज़ाहिर है। स्वाभाविक ही इसमें हिन्दी
के कई नामचीन साहित्यकारों के बारे में पढ़ने को मिलेगा। संस्मरण होने के नाते दूर से जानी या कल्पित की गयी छवियाँ नहीं हैं बल्कि एक साथी-लेखक के अनुभव के चश्मे से देखी गयी शख्सियतें हैं। इनमें शामिल हैं: नामवर
सिंह, कथाकार संजीव, विजयमोहन सिंह, से.रा. यात्री, राजेन्द्र यादव, भीष्म साहनी, असगर वजाहत, कृष्णा सोबती, कालिया दम्पति यानी रवीन्द्र कालिया और ममता कालिया, दूधनाथ सिंह, रमणिका गुप्ता, अजित राय, कवि
मान बहादुर सिंह, ‘जनमोर्चा’ अखबार के सम्पादक शीतला सिंह, कथाकार मार्कण्डेय के छोटे भाई नीलकान्त जो खुद भी कहानियाँ लिखते थे। कुछ संस्मरण साहित्यिक दुनिया के बाहर से भी हैं। इस सिलसिले में लेखक ने जहाँ पेण्टर हरिपाल त्यागी को याद किया है वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता चितरंजन सिंह और पाकिस्तान की प्रसिद्ध एक्टिविस्ट आस्मा जहाँगीर के बारे में भी बताया है। लेखक ने अपने एक संस्कृत-शिक्षक को भी याद किया है। लेकिन अधिकतर संस्मरण साहित्यकारों से सम्बन्धित हैं और उनके पाठकों को भी इसमें रस आएगा। इन संस्मरणों में अनावश्यक महिमामण्डन नहीं है पर उजले पक्षों को नजरअन्दाज भी नहीं किया गया है। स्थान के लिहाज से देखें तो इलाहाबाद के साहित्यिक परिवेश की आवृत्ति अधिक है। कहना न होगा कि यह किताब हिन्दी की संस्मरण विधा में एक उल्लेखनीय बढ़ोतरी है, पठनीय तो है ही।


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Description

JINKE SAATH JIYA MEIN (Memoirs) by Vibhuti Narayan Rai


About the Author

28 नवम्बर 1950 को जन्मे विभूति नारायण राय 1971 में अँग्रेजी से एमए करने और कुछ समय अध्यापन के बाद 1975 में भारतीय पुलिस सेवा के सदस्य बने। 2008 से 2014 तक महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त राय को सराहनीय सेवाओं के लिए इण्डियन पुलिस मेडल और राष्ट्रपति का पुलिस मेडल भी मिला। छह उपन्यास ‘घर’, ‘शहर में कर्फ्यू’, ‘किस्सा लोकतंत्र’, ‘तबादला’, ‘प्रेम की भूतकथा’ और ‘रामगढ़ में हत्या’ प्रकाशित। सभी उपन्यासों का अँग्रेजी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद। ‘रणभूमि में भाषा’, ‘फेंस के उस पार’, ‘किसे चाहिए सभ्य पुलिस’, ‘अंधी सुरंग में काश्मीर’, ‘पाकिस्तान में भगतसिंह’, ‘कुछ खादी की, कुछ खाकी की’ (लेखों के संग्रह) तथा व्यंग्यलेखों का संग्रह ‘एक छात्र नेता का रोजनामचा’ प्रकाशित। स्तम्भलेखन। ‘मेरे साक्षात्कार’ शीर्षक से साक्षात्कारों का प्रकाशन। नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद द्वारा प्रदत्त फेलोशिप के तहत दंगों के दौरान पुलिस की छवि पर शोध, जिसके फलस्वरूप पुस्तक ‘साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस’ आयी। मेरठ के दंगों (1987) पर ‘हाशिमपुरा 22 मई’ प्रकाशित। इसका भी कई भाषाओं में अनुवाद। उपन्यास ‘तबादला’ पर इंदु शर्मा कथा सम्मान, उपन्यास ‘क़िस्सा लोकतंत्र’ उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मानित, सफ़दर हाशमी सम्मान, राहुल सांकृत्यायन सम्मान, कमलेश्वर सम्मान, उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण सम्मान, राही मासूम रजा सम्मान। लगभग दो दशक तक ‘वर्तमान साहित्य’ का सम्पादन। ‘कथा साहित्य के सौ बरस’ का सम्पादन।


जिनके साथ जिया मैं - विभूति नारायण राय

Additional information

Author

Vibhuti Narayan Rai

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-780-2

Pages

107

Publication date

10-01-2026

Publisher

Setu Prakashan Samuh

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