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IKKISAVI SADI MEIN MARX AUR MANIFESTO by V.K. Singh
About the Author
वी. के. सिंह
जन्म : 15 मई 1950 को वाराणसी में।
शिक्षा: एम.ए. (अर्थशास्त्र), एम.ए. (जेंडर और विकास), एल.एल.बी.।
कार्यक्षेत्र: जीवन बीमा निगम से 2010 में प्रबन्धक
(ग्रा.सेवा/केन्द्रीय सूचना अधिकारी) पद से सेवानिवृत्त। सामाजिक-सांस्कृतिक ट्रेड यूनियन आन्दोलनों का आधी सदी से अधिक का अनुभव। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेखन। लघु पत्रिका आन्दोलन से जुड़ाव। वाराणसी में ‘कला कम्यून’ नाम से युवा कलाकारों की अभिनव सांगठनिकता की संकल्पना, स्थापना व संचालन जहाँ विभिन्न कला विधाओं: पेंटिंग, मूर्तिशिल्प, प्लास्टिक आर्ट्स, थियेटर व संगीत के लगभग पचीस कलाकार/कला छात्र एक छत के नीचे 2000 से 2010 तक वैयक्तिक और संयुक्त सृजन की प्रयोगधर्मिता में लगे रहकर उ. प्र. और बिहार के विभिन्न स्थानों पर कला मेला प्रदर्शनियों / थियेटर वर्कशाप का सफल आयोजन करते रहे। श्रमिक आन्दोलनों से सक्रिय नेतृत्वकारी जुड़ाव। जीवन बीमा निगम प्रथम श्रेणी अधिकारी फेडरेशन के पूर्व राष्ट्रीय सचिव एवं राष्ट्रीय मुखपत्र का सम्पादन। सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक-आर्थिक जेंडर विषयों पर शोध व लेखन। फिदेल कास्त्रो, चे ग्वेरा, ह्यूगो चावेज और हो ची मिन्ह की जीवनियों सहित विभिन्न ऐतिहासिक राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों एवं स्त्री विमर्श पर बीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।
पता : ‘बागेश्वरी’; बी.36/4-21 रमापुरी कालोनी, संकटमोचन, वाराणसी।

मार्क्स की दृष्टि में मनुष्य और मनुष्यता की मान्यताओं, मर्यादाओं और जीवन-मूल्यों के किसी भी बन्धन से सर्वथा मुक्त पूँजी अपने शाश्वत विस्तार की भूख में समूची दुनिया को निगल जाने के लिए निरन्तर आतुर रहती है। मनुष्य के लालच की सीमा सम्भव है, मगर खुद को निरन्तर शाश्वत रूप से पुनरुत्पादित करते रहने वाली पूँजी की दुनिया में जिसकी ‘वास्तविकता’ मनुष्य और मनुष्यता के सम्बन्धों से नहीं, बल्कि सांख्यिकीय परिमाणों से निर्मित होती है- लालच की किसी सीमा का होना सम्भव ही नहीं है। मनुष्य और मनुष्यता के किसी भी बन्धन से सर्वथा विमुक्त’ पूँजी का समाज’ सह-अनुभूति, सहकार, और सहयोग की रचनात्मक शक्ति से नहीं, बल्कि प्रभुत्व, प्रवंचना, लूट, आतंक, ठगी, धूर्तता और विनाश की विध्वंसक ‘ताकत’ से ही रचा जा सकता है। पूँजी के सिद्धान्तकार-पैरोकार मनुष्य और मनुष्यता के विध्वंस की इस प्रक्रिया को ‘सृजनात्मक विध्वंस’ (क्रियेटिव डिस्ट्रक्शन) के रूप में महिमामण्डित करते हैं। वैश्विक विस्तार लेते सृजनात्मक विध्वंस की यह’ ताकत’ सर्वशक्तिमान सर्वसक्षम ‘मुक्त बाजार’ के पास है। मुक्त बाजार राजेय-अविनाशी है- मुक्त बाजार के अन्दर अपने हर संकट के स्वतः समाधान की क्षमता सहज अन्तर्निहित है! मगर वास्तविकता के धरातल पर पूँजीवाद अपने जन्म के साथ ही आत्मघाती चक्रीय संकटों को निरन्तर जन्म देते रहने के लिए अभिशप्त है।
– इसी पुस्तक से





























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