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GURU NANAK SE GURU GOBIND SINGH by Shambhu Dayal Vajpeyi

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गुरु नानक से गुरु गोबिन्द सिंह – शंभू दयाल वाजपेयी


युद्ध जब अवश्यम्भावी हो जाता है तब संसार-त्यागी लोग उससे भाग खड़े होते हैं किन्तु, जिन्हें संसार में रहना है, वे उसे धर्मयुद्ध मानकर सोत्साह संघर्ष करते हैं। धर्मयुद्ध की परिभाषा है, वह युद्ध जिसे मनुष्य को आत्मरक्षा में लड़ना पड़ता है। सिख लड़ाई नहीं चाहते थे, लड़ाई उनपर जबर्दस्ती लादी गयी। इसलिए सिख सम्प्रदाय में ऐसे गुरु निकल आए जिन्होंने युद्ध को धर्म से समन्वित कर दिया। आत्मरक्षा में तो लड़ाइयाँ महाराणा प्रताप और क्षत्रपति शिवाजी ने भी लड़ीं, किन्तु वे युद्ध का दर्शन नहीं गढ़ सके। गुरुओं ने वीरता और बलिदान की जो ज्वाला जलायी, वह तत्कालीन हिन्दुओं में नहीं थी।
मुस्लिम काल में धर्म के नाम पर सबसे ज्वलन्त बलिदान सिखों ने दिये या फिर मेवाड़ के राजपूतों ने। यद्यपि राजपूतों में धर्माभिमान कम, अपने किलों, नगरों और बहू-बेटियों की रक्षा की चिन्ता अधिक थी।
– रामधारी सिंह दिनकर


 

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Description

GURU NANAK SE GURU GOBIND SINGH by Shambhu Dayal Vajpeyi


शंभू दयाल वाजपेयी
जन्म : असोथर, फतेहपुर (उ.प्र.) करीब 36 वर्ष की अखबारी नौकरी में सम्पादक और समूह सम्पादक तक के सफर के बाद स्वान्तः सुखाय अध्ययन-लेखन में रत। इतिहास, धर्म-दर्शन और साहित्य के अध्ययन में रुचि। सिख गुरुओं के कर्म-दर्शन के प्रति श्रद्धाभाव। जीवन-दर्शन सूत्र : जन्म है न मृत्यु है। सम्पर्क : 116 आवास विकास कालोनी, सिविल लाइन्स, बरेली, (उ.प्र.)


GURU NANAK SE GURU GOBIND SINGH
by Shambhu Dayal Vajpeyi


देहि सिवा वर मोहि ईहै सुभ करमन ते कबहूँ न टरौं। न डरौं अरि सों जब जाइ लरौं निसचै करि अपनी जीत करौं।। अरु सिख हौं अपने ही मन को इह लालच हौं गुन तउ उचरौं। जब आव की अउध निदान बनै अति ही तब रन में जूझ मरौं।। (चण्डी चरित) हे परम पिता परमात्मा ! मुझे केवल यही वरदान दो कि मैं सत्कर्मों से कभी पीछे न हदूँ। जब भी युद्ध में लड़ने जाऊँ शत्रु से कभी मेरे मन में डर न हो और दृढ़ निश्चय के साथ अपनी जीत कर लौहूँ। अपने मन को सिखा सकूँ कि वह आपके गुणों का बखान करने का लोभी बना रहे। जब मेरे जीवन का अन्तिम समय आ जाए तो मैं युद्धभूमि में पूरे उत्साह के साथ सच के लिए लड़ता हुआ मरूँ। दशम कथा भागवत की, भाषा करी बनाइ। अउर वासना नाहि कछु धरम युद्ध की चाइ ।। संसार में मुझे कोई अन्य कामना नहीं है, केवल धर्मयुद्ध का आकांक्षी हूँ।
– गुरु गोबिन्द सिंह

Additional information

Author

Shambhu Dayal Vajpeyi

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-910-3

Pages

332

Publication date

10-01-2026

Publisher

Setu Prakashan Samuh

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