Description
GURU NANAK SE GURU GOBIND SINGH by Shambhu Dayal Vajpeyi
शंभू दयाल वाजपेयी
जन्म : असोथर, फतेहपुर (उ.प्र.) करीब 36 वर्ष की अखबारी नौकरी में सम्पादक और समूह सम्पादक तक के सफर के बाद स्वान्तः सुखाय अध्ययन-लेखन में रत। इतिहास, धर्म-दर्शन और साहित्य के अध्ययन में रुचि। सिख गुरुओं के कर्म-दर्शन के प्रति श्रद्धाभाव। जीवन-दर्शन सूत्र : जन्म है न मृत्यु है। सम्पर्क : 116 आवास विकास कालोनी, सिविल लाइन्स, बरेली, (उ.प्र.)

देहि सिवा वर मोहि ईहै सुभ करमन ते कबहूँ न टरौं। न डरौं अरि सों जब जाइ लरौं निसचै करि अपनी जीत करौं।। अरु सिख हौं अपने ही मन को इह लालच हौं गुन तउ उचरौं। जब आव की अउध निदान बनै अति ही तब रन में जूझ मरौं।। (चण्डी चरित) हे परम पिता परमात्मा ! मुझे केवल यही वरदान दो कि मैं सत्कर्मों से कभी पीछे न हदूँ। जब भी युद्ध में लड़ने जाऊँ शत्रु से कभी मेरे मन में डर न हो और दृढ़ निश्चय के साथ अपनी जीत कर लौहूँ। अपने मन को सिखा सकूँ कि वह आपके गुणों का बखान करने का लोभी बना रहे। जब मेरे जीवन का अन्तिम समय आ जाए तो मैं युद्धभूमि में पूरे उत्साह के साथ सच के लिए लड़ता हुआ मरूँ। दशम कथा भागवत की, भाषा करी बनाइ। अउर वासना नाहि कछु धरम युद्ध की चाइ ।। संसार में मुझे कोई अन्य कामना नहीं है, केवल धर्मयुद्ध का आकांक्षी हूँ।
– गुरु गोबिन्द सिंह





























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