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AALOCHNA KI ZAMIN AUR NAMVAR SINGH by Shriprakash Shukla

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आलोचना की ज़मीन और नामवर सिंह – श्रीप्रकाश शुक्ल


cइसी जमीन पर रहते हुए उन्होंने हिन्दी रचनाशीलता को नयी ताजगी व ताकत भी दी जिसे उनके लेखन व उनकी वक्तृता में आसानी से लक्षित किया जा सकता है। विपुल अध्ययन, विराट चिन्तन, विलक्षण विश्लेषण सामर्थ्य व समर्पित साहित्यबोध के आधार पर उन्होंने न केवल हिन्दी परिसर में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनायी बल्कि भारतीय बौद्धिकों व साहित्यकारों के बीच भी अभूतपूर्व ख्याति अर्जित की। उनके पास पश्चिमी काव्यशास्त्र की गहरी समझ के साथ अपभ्रंश व संस्कृत साहित्य का भी प्रभूत ज्ञान था लेकिन उनके लेखन में जो चमक थी, वह भारतीय काव्यशास्त्र की धार के कारण थी। पश्चिम का ज्ञान वे एक शिक्षक के रूप में उपयोग में लाते थे लेकिन भारतीय काव्यशास्त्र के ज्ञान से वे अपने आलोचक को सक्रिय किये रहते थे। यहाँ वे आचार्य द्विवेदी जैसे कुमारिल भट्ट के सम्मुख प्रभाकर जैसे निपुण व तेजस्वी शिष्य के रूप में दिखाई देते हैं।
सम्मान के साथ विरोध का स्वर यहीं कहीं से आया है जिसे उनके अपभ्रंश व पाश्चात्य काव्यशास्त्र के अध्ययन ने धार दी। भारतीय सन्दर्भ में वे भरत, आनन्दवर्धन व अभिनवगुप्त के यहाँ बार-बार जाते हैं तो पश्चिम के आलोचना सन्दर्भ में एफ. आर. लीविस, रेमण्ड विलियम व लुसिए गोल्डमान के यहाँ; इधर कुन्तक, राजशेखर, मम्मट व पण्डितराज जगन्नाथ हैं तो उधर रिचर्ड्स, इलियट व क्लीन्थ ब्रुक्स। भारत में क्षेमेन्द्र का’ औचित्य’ है तो पश्चिम में लीविस का ‘नैतिक बोध’। यूँ ही नहीं वे हिन्दी आलोचना के वैसे ही सुमेरु लगते हैं जैसे संस्कृत के अभिनवगुप्त। छायावाद के बाद कविता की आलोचना की मन्द होती धार को उन्होंने जिस तरह से शक्तिशाली बनाया और अपने समय में लिखी जा रही नयी कविता या समकालीन कविता को जिस तरह से प्रासंगिक बनाया उसने उनको पर्याप्त लोकप्रियता दी। जिस समय में उनके समकालीन आलोचक अपनी गति में या तो ठहर गये थे या पीछे जाने लगे थे वे अकेले आलोचक थे जो नयी रचनाशीलता व नयी पीढ़ी के साथ मजबूती से खड़े थे और अग्रगामी साहित्य लेखन व हिन्दी भाषा की सामर्थ्य की शिनाख्त कर रहे थे। ऐसा नहीं था कि अन्य लोगों ने भारतीय ज्ञान परम्परा का अध्ययन नहीं किया था लेकिन इसका ऊर्ध्वमुखी, गतिशील व सार्थक उपयोग जैसा नामवर जी कर रहे थे वह बिल्कुल अलग था।
नामवर जी के शताब्दी वर्ष में प्रकाशित प्रस्तुत पुस्तक में इन्हीं कुछ सन्दर्भों की पहचान की गयी है जिसमें यह बताया गया है कि नामवर सिंह ने भारतीय ज्ञानमीमांसा को समकालीन कृतियों को समझने में किस तरह उपयोग किया और किस तरह एक नयी कृति न केवल नये सामाजिक सम्बन्धों को समझने में उपयोगी हुई बल्कि उसकी एक श्रेष्ठ रचनात्मक परम्परा भी विकसित हो सकी। नामवर जी के यहाँ यह ज्ञान परम्परा कोई ठहरी हुई वस्तु नहीं थी बल्कि यह निरन्तर विकसनशील थी। इससे न केवल किसी कृति की पृष्ठभूमि ताकतवर हुई बल्कि नये का पुराने से संवाद भी सम्भव हुआ और अपनी जातीयता व विरासत के प्रति लोगों में आकर्षण भी उत्पन्न हुआ। इसे उनके शास्त्र का लोक से संवाद के रूप में भी देखा जा सकता है।
– भूमिका से


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Description

AALOCHNA KI ZAMIN AUR NAMVAR SINGH by Shriprakash Shukla


About The Author

श्रीप्रकाश शुक्ल
जन्म : 18 मई 1965 को सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) के बरवाँ गाँव में।
शिक्षा: पी-एच.डी. (हिन्दी) (इलाहाबाद विश्वविद्यालय)।
कविता संग्रह: अपनी तरह के लोग, जहाँ सब शहर नहीं होता, बोली बात, रेत में आकृतियाँ, ओरहन और अन्य कविताएँ, कवि ने कहा (चयन), क्षीरसागर में नींद, वाया नयी सदी, झुकना किसी को रोपना है
(चयन)।
आलोचना: साठोत्तरी हिन्दी कविता में लोक सौन्दर्य, नामवर की धरती, हजारीप्रसाद द्विवेदी-एक जागतिक आचार्य, महामारी और कविता, राग रविदास, भक्ति का लोकवृत्त और रविदास की कविताई।
यात्रा संस्मरण :
देस-देस परदेस।
लेखक पर केन्द्रित पुस्तकें असहमतियों के वैभव के कवि श्रीप्रकाश शुक्ल (सं. कमलेश वर्मा, सुचिता वर्मा), कवि की बात- श्रीप्रकाश शुक्ल की रचनाओं पर एकाग्र ‘रचनावली’ पत्रिका का विशेषांक, श्रीप्रकाश शुक्ल चुनी हुई रचनाएँ, बनारस, बीएचयू और श्रीप्रकाश
शुक्ल (संस्मरण)।
सम्पादन : ‘परिचय’ नाम से एक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन।
पुरस्कार : कविता के लिए ‘बोली बात’ संग्रह पर ‘वर्तमान साहित्य’ पत्रिका का मलखानसिंह सिसोदिया पुरस्कार, ‘रेत में आकृतियाँ’ कविता संग्रह पर उ.प्र. हिन्दी संस्थान का नरेश मेहता कविता पुरस्कार, ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ कविता संग्रह के लिए उ.प्र. हिन्दी संस्थान का ‘विजयदेव नारायण साही कविता पुरस्कार’, शमशेर सम्मान-2020. कई कविताओं का अँग्रेजी, पंजाबी, मराठी भाषा में अनुवाद।
सम्प्रति : बी. एच. यू. के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं तथा भोजपुरी अध्ययन केन्द्र, बी.एच.यू. के समन्वयक रह चुके हैं।


आलोचना की ज़मीन और नामवर सिंह - श्रीप्रकाश शुक्ल

Additional information

Author

Shriprakash Shukla

Binding

Hardcover

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-008-7

Pages

220

Publisher

Setu Prakashan Samuh

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