Description
Bharatiya Chintan Parampara Aur Bheemrao Ambedkar by Niranjan Sahay
वास्तव में दलित चेतना एक प्रति-सांस्कृतिक चेतना होने के साथ-साथ एक वैकल्पिक चेतना भी है, जिसकी जड़ में भारतीय सामाजिक संरचना विद्यमान है। इसका आधार सिर्फ जाति ही नहीं थी बल्कि इसे शताब्दियों तक धार्मिक वैधता भी प्रदान की जाती रही है। इसके चलते ही बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने इससे दलित समाज को मुक्ति दिलाने हेतु बौद्ध धम्म को आधार बनाया और भारतीय संविधान की एक ऐसी समतामूलक परिकल्पना प्रस्तुत की जिसमें इस सामाजिक तथा वैचारिक जातिगत कोढ़ का उपचार किया जाना सम्भव हो। दलित-मुक्ति आन्दोलन में आंबेडकर के करिश्माई नेतृत्व के योग ने भारतीय लोकतान्त्रिक समझ को सच्चे अर्थों में मानवीय सरोकारों और प्रगतिवादी समझ से सम्पन्न किया। डॉ. आंबेडकर ने उत्पीड़ित और वंचित जीवन के दंश को बखूबी समझा था। अनुभव की इस तपन को उन्होंने जीवन के सरोकारों में शामिल किया और वैधानिक प्रावधानों में उन्हें शामिल कराकर भारतीय लोकतन्त्र की जवाबदेही उनके प्रति तय की जिन्हें मानवाधिकारों से वंचित कर सामाजिक एवं आर्थिक स्तर पर नकारकर हाशिये पर धकेल दिया गया था।


























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