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GHIR GAYA HAI SAMAY KA RATH by Ravindra Shobhne

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घिर गया है समय का रथ – रवीन्द्र शोभणे

(मराठी उपन्यास ‘कोंडी’ का हिन्दी अनुवाद) अनुवादक :डॉ. सरजूप्रसाद मिश्र


‘घिर गया है समय का रथ’ मराठी के विख्यात उपन्यास ‘कोंडी’ का हिन्दी अनुवाद है। ‘कोंडी’ का अर्थ होता है आसपास की कठिन स्थिति, बेहद प्रतिकूल स्थिति या फिर वैसी स्थिति से उत्पन्न तकलीफें। भारतीय समाज जीवन में कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था का अपना महत्त्व है। नब्बे के बाद ग्रामीण जीवन नगरीकरण के नये आक्रमण से पूरी तरह से घिर गया। परिणामस्वरूप ग्रामीण जीवन-मूल्यों में भारी परिवर्तन हुए। उन परिवर्तनों का चित्रण अपने लेखन के जरिये करने वाले उपन्यासकार के रूप में रवीन्द्र शोभणे जी की ओर देखा जाता है। उस दौरान युवा पीढ़ी के सवालों तथा उनकी मानसिकता में भारी परिवर्तन हो रहे थे। और उन परिवर्तनों की ओर ध्यान देना आवश्यक था। लेकिन सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर इन सवालों और परिवर्तनों की ओर उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा था। क्योंकि अपना समाज स्थिर था। अलबत्ता उस समय के साहित्य और कला के जरिये इन सवालों को अधिक गम्भीरता से देखा और सोचा जा रहा था। उसी दौरान यह उपन्यास मराठी क्षेत्र में दाखिल हुआ और उसने इन सवालों को कलात्मक तरीके से प्रस्तुत करने वाले उपन्यास के रूप में सबका ध्यान आकृष्ट कर लिया।
वसन्ता बचपन से अपने पिता तथा परिवार पर होने वाले अन्याय को देखते हुए उस व्यवस्था के विरोध में खड़ा हो जाता है। परिस्थितियों को अपनी नियति मान चुके उसके माता-पिता को उसका इस तरह से व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना नागवार गुजरता है। इसी मतभिन्नता की वजह से दो पीढ़ियों का संघर्ष सामने आता है। जाने-अनजाने वसन्ता इस व्यवस्था में अमीरों के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाता है। गाँव-कस्बों की राजनीति और वहाँ के नेता उसे अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल कर, जब आवश्यकता नहीं होती उसे दूर हटा देते हैं। गाँव में वह गुण्डे के रूप में बदनाम हो जाता है। किसी धनवान के हाथों की वह कठपुतली बन गया है, इस बात का उसे जब एहसास होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इस उपन्यास की रीढ़ है ग्रामीण परिवेश, वहाँ की परम्पराएँ, बोली-भाषा तथा संस्कारों आदि से जुड़े हुए वहाँ के आम लोग। ग्रामीण क्षेत्र ही नहीं बल्कि भारतीय युवाओं की मानसिकता को प्रभावी तरीके से अभिव्यक्त करने वाला यह उपन्यास मराठी साहित्य में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ चुका है। सीधी-सादी भाषा, चुटीले व्यक्तिचित्रण, असरदार लेखन और सन्तुलित कथा-निर्वाह की वजह से ‘घिर गया है समय का रथ’ पाठकों के दिल तक पहुँचता है।


 

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Description

GHIR GAYA HAI SAMAY KA RATH by Ravindra Shobhne


About The Author

रवीन्द्र शोभणे
जन्म : 15 मई 1959. कहानी, उपन्यास, आलोचना, ललित लेखन, सम्पादन, व्यक्तित्व-चित्रण आदि विभिन्न विधाओं में सहजता से अपने लेखन के जरिये अपनी मुहर लगाने वाला मराठी साहित्य की दुनिया का एक महत्त्वपूर्ण नाम। खरसोली (ता. नरखेड, जिला नागपुर) में बिल्कुल साधारण परिवार में जन्म। विद्यार्थी जीवन से ही लेखन की शुरुआत। 1983 में ‘प्रवाह’ नाम से पहला उपन्यास प्रकाशित। अब तक ग्यारह उपन्यास, आठ कहानी संकलन, छह आलोचनात्मक किताबों के साथ मराठी साहित्य में बेहतरीन योगदान।
अपने लेखन के जरिये मानवी रिश्तों की जटिलता, इंसानी रिश्तों में उभरने वाले परिवर्तनों की खोज, बाहरी वास्तविकता के आक्रमण से मानवी भावविश्व में होने वाली मूल्यों और आदर्शों की गिरावट आदि बातें उनके लेखन की विशेषताएँ हैं। जीवन की वास्तविकता को गहरे और चिन्तनशील स्तर पर निरन्तर खोजना यह रवीन्द्र शोभणे जी के लेखन का मूलधर्म है।
मराठी साहित्य में श्रेष्ठ रचनाकारों को दिये जाने वाले महाराष्ट्र शासन के सर्वोच्च पुरस्कार विंदा करंदीकर जीवन गौरव पुरस्कार से सम्मानित। कहानी, उपन्यास और आलोचना, इन विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन के लिए अन्य कई महत्त्वपूर्ण पुरस्कारों से सम्मानित। सन् 2024 में अमलनेर (जि. जळगांव) में सम्पन्न हुए 97वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता से गौरवान्वित ।


GHIR GAYA HAI SAMAY KA RATH (Hindi Novel)

Additional information

Author

Ravindra Shobhne

Translation

Dr. Sarjooprasad Mishra

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-554-9

Pages

256

Publication date

10-01-2026

Publisher

Setu Prakashan Samuh

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