-20.00%

MANTO SAAB : Doston ki Nazar mein by Zahid Khan

Original price was: ₹375.00.Current price is: ₹300.00.

मंटो साब दोस्तों की नज़र में

उर्दू से हिन्दी अनुवाद और सम्पादन:  ज़ाहिद खान


किताब में शामिल मंटो के दोस्त
कृश्न चन्दर, शाहिद अहमद देहलवी, मुहम्मद असद्धल्लाह, इस्मत चुगताई, बलवन्त गार्गी, नरेश कुमार शाद, अहमद नदीम क़ासमी, शोरिश काश्मीरी, मिर्जा अदीब, नसीर अनवर, मुहम्मद ख़ालिद अख्तर, राजा मेहदी अली खान, अली सरदार जाफ़री, इब्राहीम जलीस, हमीद अख़्तर, मुहम्मद तुफैल


फ़िराक़ साहब ने एक जगह बहुत पते की बात कही है। शे’र-ओ-शायरी की चर्चा करते हुए फ़रमाते हैं कि शे’र को समझना शे’र कहने से कहीं बहुत मुश्किल है। उनकी यह बात ऊँची सतह के हर अदब पारे के लिए सही कही जाएगी और इसलिए यह बात यक़ीनन मंटो के बारे में सच है, जिसके यहाँ कबाड़ तो बहुत है, लेकिन ऊँचे दर्जे का अदब भी कुछ कम नहीं है। एक लम्बे अरसे तक मंटो को पढ़ चुके हजरात भी यह दावा नहीं कर सकते कि उन्होंने मंटो को भलीभाँति समझ लिया है। यहाँ हमारे दोस्त जाहिद खान ने इस किताब में जो ख़ाके जमा किये हैं, उनकी उपयोगिता को इसी सन्दर्भ में परखा जाना चाहिए। जहाँ जदीदीयत की यह बात सही है कि किसी अदीब की ज़िन्दगी और अदब में कोई सम्बन्ध होना जरूरी नहीं है, वहीं हम यह दावा नहीं कर सकते कि अदीब की ज़िन्दगी और अदब में कोई सम्बन्ध होता ही नहीं। लेकिन हम इतना तो कह ही सकते हैं कि ख़ाके इस सिलसिले में यक़ीनन कुछ रहनुमाई कर सकते हैं। हाली की ‘यादगार-ए-ग़ालिब’ को किनारे रखकर हम ग़ालिब को समझने के कितने क़ाबिल हो सकते हैं? मंटो के समकालीनों ने मंटो के बारे में ये जो ख़ाके लिखे हैं, उनमें अगर थोड़ा-बहुत पूर्वाग्रह हो, तो भी मंटो को समझने में ये एक हद तक मददगार तो हो ही सकते हैं, और इनको इसी नजरिये से पढ़ा जाना चाहिए, इसी नजरिये से परखा भी जाना चाहिए। इतनी बात तो जरूर याद रहनी चाहिए कि मंटो की शख्सियत बहुत विवादास्पद रही है, और उसे कोई ख़ाका-निगार किस नज़रिये से देखता है, इसकी भी अपनी जगह एक अहमियत है।
— नरेश ‘नदीम’
(वरिष्ठ आलोचक और चर्चित अनुवादक)


Buy Instantly Using RazorPay Payment Gateway

In stock

SKU: MANTO SAAB : Doston ki Nazar mein-PB Category:

Description

उर्दू से हिन्दी अनुवाद और सम्पादन:  ज़ाहिद खान
सहयोग :इशरत ग्वालियरी


ज़ाहिद खान
भारतीय साहित्य में चले प्रगतिशील आन्दोलन पर जाहिद ख़ान का विस्तृत कार्य है। उनकी कुछ अहम किताबें हैं : ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफ़र’, ‘तरक्कीपसंद तहरीक की रहगुजर’, ‘आधी आबादी अधूरा सफ़र’, ‘शैलेन्द्र : हर जोर-जुल्म की टक्कर में’ (सम्पादन); ‘बलराज साहनी : एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ (सम्पादन), ‘मखदूम मोहिउद्दीन सुर्ख सवेरे का शायर’ (अनुवाद और सम्पादन) और ‘मजाज हूँ सरफ़रोश हूँ मैं’ (अनुवाद और सम्पादन)। उन्होंने कृश्न चन्दर के ऐतिहासिक रिपोर्ताज ‘पौदे’, हमीद अख्तर की किताब ‘रूदाद-ए-अंजुमन’, अली सरदार जाफ़री का ड्रामा ‘यह किसका खून है!’, कृश्न चन्दर का ड्रामा ‘दरवाजे खोल दो’ और उर्दू के अहम अफ़साना-निगारों पर केन्द्रित किताब ‘कुछ उनकी यादें कुछ उनसे बातें’ का उर्दू से हिन्दी लिप्यन्तरण और अनुवाद किया है। मुम्बई की संस्था ‘पॉपुलेशन फ़र्स्ट’ ने जाहिद खान को सात बार ‘लाडली मीडिया एंड एडवरटाइजिंग अवार्ड फॉर जेंडर सेंसिटिविटी’ पुरस्कार से सम्मानित किया है। उनकी किताब ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ मराठी और उर्दू जबान में अनूदित हो चुकी है। इस किताब के लिए उन्हें मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ से नवाजा गया है।

mantoo-saab-hindi-book-paperback


Additional information

Editor

Zahid Khan

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-545-7

Pages

254

Publisher

Setu Prakashan Samuh

Publication date

10-01-2026

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “MANTO SAAB : Doston ki Nazar mein by Zahid Khan”

You may also like…

0
YOUR CART
  • No products in the cart.