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BAITHE HUE HAATHI KE BHITAR LADKA – by Anand Harshul

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बैठे हुए हाथी के भीतर लड़का – आनंद हर्षल


आनंद हर्षल की कहानियाँ समकालीन जीवन के दृश्यपटल पर प्रभुता के अपसरण तथा उसके विराट सम्मोहन के समक्ष मानवीय लघुता की निरीह-निर्बल उपस्थिति को अथवा उसके आत्म-संकुचन को रेखांकित करती हैं। प्रभुता कहीं प्रत्यक्ष और अतिक्रामक है, कहीं नेपथ्य में छिपी हुई। किन्तु उसकी कठोर जकड़ में तड़पती लघुता के दृश्य यहाँ बार-बार प्रकट होते हैं और उस सामाजिक द्वैत की ओर संकेत करते हैं, जो जीवन को दो विषम फाँकों में बाँट देता है। इस विकट द्वैत की सरलीकृत व्याख्या से बचते हुए यहाँ जीवन-सत्य को अनुभव के वास्तव-रूपों में मूर्त कर कथा-सत्य में संघटित किया गया है।
सच कहा जाए तो ये कहानियाँ मानवीय निरीहता की मर्म गाथाएँ हैं : ग़ौर किया जाना चाहिए कि इनमें अधिकतर पात्र बच्चे या बूढ़े हैं, अपनी निर्बलता में जीते जूझते निरीह पात्र। वे मनुष्यता की निष्पाप छवियाँ हैं, किन्तु इस कदर प्रामाणिक और प्रारूपिक, कि निरीहता और तुच्छता का जीवन्त प्रतीक ही बन जाएँ। इस तरह प्रतीकवत्ता की नज़र से देखें तो इन कहानियों का, किंचित् भिन्न स्तर पर, एक अन्योक्तिपरक पाठ भी सम्भव है, किन्तु जाहिर है, यह निरा वैकल्पिक पाठ होगा। वस्तुतः निरीहता यहाँ संकल्परहित अथवा नियतिग्रस्त कतई नहीं है। कहानी कहे जाने की प्रक्रिया के दौरान यह प्रतिवाद की भाषिक अन्तः दीप्ति में उभरती है और जीवन-विडम्बना को आकार देती है। प्रतिवाद कहानियों की सतह पर तैरता नजर नहीं आता, उनके भीतर भाषा में सुगबुगा रहा होता है। यही कारण है कि अपने समय से जूझते हुए पात्र अपनी निपट सहजता में उसे जीते हुए दिखाई देते हैं। इस प्रकार जीने के मानवीय उपक्रम को आनंद हर्षल संघर्ष और प्रतिरोध के सुचारु मुहावरे में चिह्नित करने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उससे भरसक बचते हैं। यातना को भाषा में आयत्त करने के प्रयत्न में वे एक ऐसा संसार सम्भव करते हैं, जो एक ओर जीवन-सन्दर्भों के हाहाकारी प्रक्षेप में उठी उदग्र मुद्राओं से और दूसरी ओर अनुभववाद की आत्म-साधना में उपजे दैन्य से सर्वथा मुक्त है।
इन कहानियों का यथार्थ प्रायः अननुमेय है, इसलिए वह रीतिरूढ़, शैलीकृत अथवा सूत्रबद्ध भी नहीं जान पड़ता। वह कहानी की प्रचलित मर्यादाओं और अपेक्षाओं के निर्वाह की अधिक चिन्ता न कर अपनी अनवरुद्ध गति में बहता स्वच्छन्द यथार्थ है। आसानी से उसे वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।
दरअसल यथार्थ की इस तरल उठान को एक क़िस्म की स्वैर वृत्ति निरन्तर यत्नपूर्वक साधे रखती है। धीरे-धीरे उसकी विलक्षणता आकार लेती और आक्रान्त करती है।
इस प्रक्रिया में कथा-भाषा का विनियोग इस कौशल के साथ किया गया है कि कहानी की संवेदना अपनी गतिशील चित्रात्मकता में क्रमशः अपेक्षित विन्यास प्राप्त करने लगती है। विवरण की सूक्ष्मता को कथा-संवेग में कल्पान्तरित करते हुए स्वयं भाषा एक अनूठी चारित्रिक इयत्ता हासिल करती है। भाषा के स्वैरकल्पक चरित्र की तलाश करते हुए आनंद ने सर्वत्र ही अचूक आत्म-निग्रह के साक्ष्य दिये हैं। वे भाषा का सौष्ठव खड़ा नहीं करते, उसे यथार्थ का सच्चा साझीदार बनाते हैं।


 

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Description

BAITHE HUE HAATHI KE BHITAR LADKA (A Collection of stories) – by Anand Harshul


About the Author

आनंद हर्षल

आनंद हर्षल का जन्म 23 जनवरी 1959 को हुआ। वह ऐसे कथाकार हैं जिनके यहाँ, अत्यन्त संवेदनशील तथा कल्पना प्रवण गद्य के रूप में, एक विरल किस्म की सर्जनात्मक चेष्टा दिखाई देती है। उनके यहाँ भाषा उड़ान लेती है और यथार्थ को विलक्षण ढंग से मुक्त करती है। उनके पाँच कहानी संग्रह-‘बैठे हुए हाथी के भीतर लड़का’, ‘पृथ्वी को चन्द्रमा’, ‘रेगिस्तान में झील’, ‘अधखाया फल’, एवं ‘चिड़िया और मुस्कराहट’ तथा तीन उपन्यास ‘चिड़िया बहनों का भाई’, ‘देखना’ एवं ‘रेतीला’ तथा एक सम्पादित पुस्तक, ‘अनगिन से निकलकर एक’ अब तक प्रकाशित हैं। उनकी रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। वे सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार (1997), विजय वर्मा अखिल भारतीय कथा सम्मान (2003), वनमाली कथा सम्मान (2014) तथा संस्कृति मन्त्रालय, भारत सरकार की सीनियर फेलोशिप (2020-21) से सम्मानित हैं।


BAITHE HUE HAATHI KE BHITAR LADKA - by Anand Harshul

Additional information

Author

Anand Harshul

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-935-6

Pages

174

Publication date

10-01-2026

Publisher

Setu Prakashan Samuh

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