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TAKI SANAD RAHE : AAPATKAAL MEIN LOKSABHA by Rajgopal Singh Verma

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…ताकि सनद रहे आपातकाल में लोकसभा

असहमति, आक्रोश और मुखर प्रतिरोध के साथ निष्ठा, समर्थन और अन्धभक्ति के स्वरों का विवरण
— राजगोपाल सिंह वर्मा


आपातकाल यानी जून 1975 में देश में लगायी गयी इमरजेंसी को लेकर परस्पर विरोधी दृष्टिकोण से चर्चा व
बहस का सिलसिला निरन्तर बना रहा है। तत्कालीन सत्तापक्ष और उसके राजनीतिक वारिस जहाँ आपातस्थिति की घोषणा को एक समय विशेष की ऐतिहासिक अनिवार्यता बताते रहे हैं वहीं प्रतिपक्ष उसे लोकतन्त्र का हनन करार देता आया है। जाहिर है एक पक्ष ने इसे अपवाद
माना, तो दूसरे पक्ष ने विचलन। लेकिन यह किताब ‘…ताकि सनद रहे : लोकसभा में आपातकाल’ उपर्युक्त
दोनों दृष्टिकोणों में से किसी का भी प्रतिनिधित्व नहीं करती। यह बस पृष्ठभूमि और सन्दर्भ बताते हुए एक
ऐतिहासिक विवरण पेश करती है; और वह यह कि आपातस्थिति घोषित होने के बाद लोकसभा में उस बारे में
क्या बहस हुई थी। उस अवधि की लोकसभा की कार्यवाही पढ़ते हुए आपातकाल को लेकर सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष की सारी दलीलें हमारे सामने आ जाती हैं और देश-दुनिया के तत्कालीन हालात का भी कुछ अन्दाजा होता है। भारत के राजनीतिक इतिहास के इस बेहद विवादित कालखण्ड के वस्तुगत मूल्यांकन में जिनकी रुचि हो उनके लिए खासतौर से पक्ष-विपक्ष, दोनों तरफ से दिये गये वक्तव्यों और सारे तर्कों-प्रतितौं से गुजरना, उनपर गौर करना जरूरी हो जाता है। आपातकाल पर अनेक किताबें लिखी गयी हैं जिनमें अपने-अपने संस्मरण, अपनी-अपनी कहानियाँ और अपना-अपना पक्ष-पोषण है। लेकिन यह किताब न कोई वृत्तान्त है न विश्लेषण। यह एक दस्तावेज है जो सभी के काम आ सकता है, चाहे उनका राजनीतिक या विचारधारात्मक रुझान कुछ भी हो। ऐतिहासिक महत्त्व की इस सामग्री को जुटाने का जतन किया है इतिहास के अध्येता राजगोपाल सिंह वर्मा ने। परिशिष्ट में आपातस्थिति के सम्बन्ध में तत्कालीन राष्ट्रपति की उ‌द्घोषणा और राष्ट्र के नाम तत्कालीन प्रधानमन्त्री के सन्देश को संकलित करके उन्होंने इस किताब को दस्तावेजी लिहाज से और भी अहम बना दिया है। आशा की जानी चाहिए कि उनका यह उद्यम सार्थक और स्वागतयोग्य माना जाएगा।


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Description

TAKI SANAD RAHE : AAPATKAAL MEIN LOKSABHA by Rajgopal Singh Verma


बहस की समाप्ति के बाद निर्णय की लम्बी घड़ियाँ शुरू हुई। दोनों पक्ष बराबर रूप से मुकदमा जीतने के प्रति आशान्वित थे। भूषण का भरोसा था कि उनके पास जीतने के अधिक अवसर थे। दूसरी ओर खरे को यह बात हास्यास्पद लगती थी कि मुकदमा उनके मुवक्किल प्रधानमन्त्री के विरुद्ध जा सकता है।
इसके अलावा अन्य जगहों पर भी, इस बात को लेकर कयास लगाये जा रहे थे कि निर्णय क्या होगा। यह माना जा सकता है कि उत्साही लोगों द्वारा मुकदमे के निर्णय को लेकर शर्ते लगायी जा रही थीं जिसमें बहुत सी धनराशि का आदान-प्रदान हो रहा था। एक ध्यान देने योग्य तथ्य यह था कि जो लोग इस मुकदमे के साक्षी रहे थे; और जिन्होंने न्यायालय की प्रक्रियाओं को देखा था, उनमें और अन्य लोगों के दृष्टिकोणों में भारी मतभिन्नता थी। जिन लोगों ने बहस सुनी थी, वे दोनों सम्भावनाओं पर बराबर थे। लेकिन जिन लोगों ने न्यायालय में हुई बहस नहीं सुनी थी उन्हें न्यायमूर्ति सिन्हा की ‘दृढ़ता’ में संशय था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बाहरी क्षेत्रों में आमतौर पर धारणा यह थी कि न्यायमूर्ति के पास इतना साहस नहीं हो सकता कि वह इस चुनाव को निरस्त घोषित कर सकें। यह तथ्य कि इस मुकदमे की प्रतिवादी प्रधानमन्त्री थीं, उन लोगों में अतिरिक्त भय पैदा करता था जो मुकदमे की निष्पक्षता के बिन्दुओं पर स्वतन्त्र अभिमत रखना चाहते थे।
बताया जाता है कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सिन्हा हो रही बहस के लगातार नोट्स लेते रहे थे। इसलिए, जैसे ही न्यायालय की कार्यवाही पूरी हुई, वह निर्णय लिखवाने के लिए तैयार थे। चर्चा है कि उन्होंने निर्णय लिखवाने से पहले अपने निजी सचिव से कहा, “मैं नहीं चाहता कि इस निर्णय की भनक किसी को भी लगे, तुम्हारी पत्नी तक को भी। यह एक बड़ी जिम्मेदारी है। क्या तुम इसे
निभा सकोगे ?” उनका यह सचिव न्यायमूर्ति के साथ लम्बे समय से था, और एक भरोसेमन्द आदमी था। उसने शपथ ली कि वह इस निर्णय के विषय में अपनी पत्नी को भी नहीं बताएगा।
न्यायमूर्ति सिन्हा इस मुकदमे का निर्णय शान्ति से लिखवाना चाहते थे। परन्तु न्यायालय बन्द होते ही उनसे लोग मिलने आने लगे। उनमें इलाहाबाद के काँग्रेस सांसद भी थे, जिनसे वह उस समय मिलना नहीं चाहते थे। पर जब उनकी कोशिशें कामयाब नहीं हुईं तो उन्होंने आगन्तुकों से कहलवाया दिया कि वह उज्जैन चले गये हैं, जहाँ उनके भाई रहते थे। इस प्रकार वह 28 मई से 7 जून तक व्यावहारिक रूप से गायब रहे, न किसी से मिलना, न कोई फोन कॉल।
पर इस बीच देहरादून से एक कॉल आयी, जिस पर बात करने से वह मना नहीं कर सकते थे। वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की कॉल थी। वह चाहते थे कि निर्णय को जुलाई माह तक स्थगित कर दिया जाए। यह सम्भवतः इसलिए कहा गया था कि श्रीमती इन्दिरा गांधी मेक्सिको में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन में भाग लेने जा रही थीं; और वह चाहती थीं कि जब निर्णय आए तो उस समय वह भारत में हों। परन्तु जस्टिस सिन्हा इस सुझाव पर नाराज हो गये और उसे मानने से इनकार कर दिया। वह तत्काल उच्च न्यायालय के लिए रवाना हुए और रजिस्ट्रार को आदेश दिया गया कि वह दोनों पक्षों तथा मीडिया को सूचित करें कि निर्णय 12 जून को सुनाया जाएगा।

पृष्ठ संख्या १२ से कुछ विशेष


Additional information

Author

Rajgopal Singh Verma

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

978-93-6201-939-4

Publication date

20-06-2025

Pages

328

Publisher

Setu Prakashan Samuh

3 reviews for TAKI SANAD RAHE : AAPATKAAL MEIN LOKSABHA by Rajgopal Singh Verma

  1. Mausam Taneja

    Very Detailed and Nice References to understand the emergency .

  2. Akaash

    I am a regular reader of this writer and I have gained a knowledge base, which was missing in my life. Well crafted and about the neglected aspect of the important incidence of our political scenario — the Emergency, notable the deliberations of it it Lok Sabha is covered exhaustively. Well deserved read.

  3. Kavit Kumar

    Very Interesting Read, very detailed references.

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