Description
TAKI SANAD RAHE : AAPATKAAL MEIN LOKSABHA by Rajgopal Singh Verma
बहस की समाप्ति के बाद निर्णय की लम्बी घड़ियाँ शुरू हुई। दोनों पक्ष बराबर रूप से मुकदमा जीतने के प्रति आशान्वित थे। भूषण का भरोसा था कि उनके पास जीतने के अधिक अवसर थे। दूसरी ओर खरे को यह बात हास्यास्पद लगती थी कि मुकदमा उनके मुवक्किल प्रधानमन्त्री के विरुद्ध जा सकता है।
इसके अलावा अन्य जगहों पर भी, इस बात को लेकर कयास लगाये जा रहे थे कि निर्णय क्या होगा। यह माना जा सकता है कि उत्साही लोगों द्वारा मुकदमे के निर्णय को लेकर शर्ते लगायी जा रही थीं जिसमें बहुत सी धनराशि का आदान-प्रदान हो रहा था। एक ध्यान देने योग्य तथ्य यह था कि जो लोग इस मुकदमे के साक्षी रहे थे; और जिन्होंने न्यायालय की प्रक्रियाओं को देखा था, उनमें और अन्य लोगों के दृष्टिकोणों में भारी मतभिन्नता थी। जिन लोगों ने बहस सुनी थी, वे दोनों सम्भावनाओं पर बराबर थे। लेकिन जिन लोगों ने न्यायालय में हुई बहस नहीं सुनी थी उन्हें न्यायमूर्ति सिन्हा की ‘दृढ़ता’ में संशय था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बाहरी क्षेत्रों में आमतौर पर धारणा यह थी कि न्यायमूर्ति के पास इतना साहस नहीं हो सकता कि वह इस चुनाव को निरस्त घोषित कर सकें। यह तथ्य कि इस मुकदमे की प्रतिवादी प्रधानमन्त्री थीं, उन लोगों में अतिरिक्त भय पैदा करता था जो मुकदमे की निष्पक्षता के बिन्दुओं पर स्वतन्त्र अभिमत रखना चाहते थे।
बताया जाता है कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सिन्हा हो रही बहस के लगातार नोट्स लेते रहे थे। इसलिए, जैसे ही न्यायालय की कार्यवाही पूरी हुई, वह निर्णय लिखवाने के लिए तैयार थे। चर्चा है कि उन्होंने निर्णय लिखवाने से पहले अपने निजी सचिव से कहा, “मैं नहीं चाहता कि इस निर्णय की भनक किसी को भी लगे, तुम्हारी पत्नी तक को भी। यह एक बड़ी जिम्मेदारी है। क्या तुम इसे
निभा सकोगे ?” उनका यह सचिव न्यायमूर्ति के साथ लम्बे समय से था, और एक भरोसेमन्द आदमी था। उसने शपथ ली कि वह इस निर्णय के विषय में अपनी पत्नी को भी नहीं बताएगा।
न्यायमूर्ति सिन्हा इस मुकदमे का निर्णय शान्ति से लिखवाना चाहते थे। परन्तु न्यायालय बन्द होते ही उनसे लोग मिलने आने लगे। उनमें इलाहाबाद के काँग्रेस सांसद भी थे, जिनसे वह उस समय मिलना नहीं चाहते थे। पर जब उनकी कोशिशें कामयाब नहीं हुईं तो उन्होंने आगन्तुकों से कहलवाया दिया कि वह उज्जैन चले गये हैं, जहाँ उनके भाई रहते थे। इस प्रकार वह 28 मई से 7 जून तक व्यावहारिक रूप से गायब रहे, न किसी से मिलना, न कोई फोन कॉल।
पर इस बीच देहरादून से एक कॉल आयी, जिस पर बात करने से वह मना नहीं कर सकते थे। वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की कॉल थी। वह चाहते थे कि निर्णय को जुलाई माह तक स्थगित कर दिया जाए। यह सम्भवतः इसलिए कहा गया था कि श्रीमती इन्दिरा गांधी मेक्सिको में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन में भाग लेने जा रही थीं; और वह चाहती थीं कि जब निर्णय आए तो उस समय वह भारत में हों। परन्तु जस्टिस सिन्हा इस सुझाव पर नाराज हो गये और उसे मानने से इनकार कर दिया। वह तत्काल उच्च न्यायालय के लिए रवाना हुए और रजिस्ट्रार को आदेश दिया गया कि वह दोनों पक्षों तथा मीडिया को सूचित करें कि निर्णय 12 जून को सुनाया जाएगा।
पृष्ठ संख्या १२ से कुछ विशेष






























Mausam Taneja –
Very Detailed and Nice References to understand the emergency .
Akaash –
I am a regular reader of this writer and I have gained a knowledge base, which was missing in my life. Well crafted and about the neglected aspect of the important incidence of our political scenario — the Emergency, notable the deliberations of it it Lok Sabha is covered exhaustively. Well deserved read.
Kavit Kumar –
Very Interesting Read, very detailed references.