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Bhartiya Manas Ka Vi-Aupniveshikaran By Ambikadatt Sharma (Paperback)

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भारतीय मानस का वि-औपनिवेशीकरण || प्रामाणिक संस्कृतात्मा के प्रत्यभिज्ञान की कार्ययोजना ||

औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया और उत्तर-औपनिवेशिक प्रभाव में भारत का कम से कम तीन बार आत्मविभाजन हुआ है। भारत के वर्तमान को उसके गौरवशाली अतीत से काट दिया जाना पहला आत्मविभाजन था। इसका परिणाम यह हुआ कि हम अपनी ही संस्कृति और सभ्यता के प्रति हीन भावना से ग्रस्त हुए और इस तरह भारत के वर्तमान को आधुनिक यूरोप से प्रतिकृत होने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से विवश कर दिया गया। दूसरा आत्मविभाजन स्वातन्त्र्योत्तर काल में राजनीति और संस्कृति के बीच उतरोत्तर बढ़ते हुए पार्थक्य के कारण हुआ है। इसके चलते वह भारत जो एकात्मक गुण-सूत्रों वाला सांस्कृतिक राष्ट्र था, औपनिवेशिक प्राधिकरण से मुक्त होकर भी संस्कृतिविहीन एक राजनीतिक राष्ट्र-राज्य में रूपान्तरित होकर रह गया। भारत का तीसरा आत्मविभाजन भाषाई आधार पर हुआ है। इस देश में अँग्रेज़ी ने राष्ट्रीता की भाषा की पदवी को अख्तियार कर लिया और भारतीय भाषाएँ बहुविध उप-राष्ट्रीता की भाषाएँ बन कर रह गयीं। इस तरह राष्ट्रीयता और उप-राष्ट्रीयताओं में विभाजित भारत से राष्ट्रीयता विलुप्त कर दी गयी। इस पुस्तक में भारतीय मानस के औपनिवेशीकरण और वि-औपनिवेशीकरण को उपर्युक्त तीनों आत्मविभाजनों के व्यापक सन्दर्भ में समझने का मूल्यवान् वैचारिक उपक्रम साधा गया है। यह उपक्रम एक ‘समझ की कार्ययोजना’ है, क्योंकि औपनिवेशीकरण मूलतः संस्कृतात्मा के स्वरूप विषयक अज्ञान की समस्या है; इसीलिए इसकी फलश्रुति भारतीय संस्कृतात्मा का प्रामाणिक प्रत्यभिज्ञान है।


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Description

भारत में आत्मविभाजन की एक व्याख्या मूलतः हिंदी में दार्शनिक अम्बिकादत्त शर्मा ने इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत की है। इस गंभीर विषय पर एक से अधिक व्याख्याएँ न सिर्फ़ संभव हैं बल्कि अभीष्ट भी।

About the Author:

प्रो. अम्बिकादत्त शर्मा
(जन्म: १९६०) काशी की पाण्डित्य परम्परा और आचार्य कुल में दीक्षित दर्शनशास्त्री हैं। आपने दर्शनशास्त्र में एम.ए. (१९८५) एवं पी-एच.डी. (१९८८) की उपाधि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से तथा बौद्धदर्शनाचार्य (१९९५) की उपाधि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्राप्त की है।
आप भारतीय तत्त्वविद्या, प्रमाणशास्त्र, भाषादर्शन एवं साभ्यतिक अध्ययन के दीक्षित और शिक्षित परिपृच्छाधर्मी अध्येता हैं। दर्शन और संस्कृति-चिन्तन के क्षेत्र में आपके वैचारिक-विमर्शपरक लेखन समकालीन भारतीय दार्शनिकों में समादृत हैं। आपके द्वारा लिखित एवं सम्पादित बीस से अधिक ग्रन्थ प्रकाशित हैं। भारत के वैचारिक स्वराज और राष्ट्रभाषा के राजपथ पर दर्शन के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान एवं प्रगत शोधपरक गवेषणाओं के लिए आपको अनेक सम्मानों से विभूषित किया गया है।
प्रो. अम्बिकादत्त शर्मा सम्प्रति डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) में दर्शनशास्त्र के आचार्य, दर्शन प्रतिष्ठान, जयपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘उन्मीलन’ के सम्पादक और डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय की शोध-पत्रिका ‘मध्य भारती’ के प्रधान सम्पादक हैं।

 

Additional information

ISBN

9789389830439

Author

Ambikadatt Sharma

Binding

Paperback

Pages

112

Publication date

01-01-2020

Publisher

Setu Prakashan Samuh

Imprint

Setu Prakashan

Language

Hindi

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