Shriramakrishna Paramhansa Edited By Awadhesh Pradhan

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श्रीरामकृष्ण परमहंस – संपादक अवधेश प्रधान


“कछुआ रहता तो पानी में है, पर उसका मन रहता है किनारे पर जहाँ उसके अण्डे रखे हैं। संसार का काम करो, पर मन रखो ईश्वर में।”

“बिना भगवद्-भक्ति पाये यदि संसार में रहोगे तो दिनोदिन उलझनों में फँसते जाओगे और यहाँ तक फँस जाओगे कि फिर पिण्ड छुड़ाना कठिन होगा। रोग, शोक, तापादि से अधीर हो जाओगे। विषय-चिन्तन जितना ही करोगे, आसक्ति भी उतनी ही अधिक बढ़ेगी।”
“संसार जल है और मन मानो दूध । यदि पानी में डाल दोगे तो दूध पानी में मिल जाएगा, पर उसी दूध का निर्जन में मक्खन बनाकर यदि पानी में छोड़ोगे तो मक्खन पानी में उतराता रहेगा। इस प्रकार निर्जन में साधना द्वारा ज्ञान-भक्ति प्राप्त करके यदि संसार में रहोगे भी तो संसार से निर्लिप्त रहोगे।”
– इसी पुस्तक से

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Shriramakrishna Paramhansa Edited By Awadhesh Pradhan


About The Author


श्रीरामकृष्ण परमहंस (18 फरवरी 1836-16 अगस्त 1886) एक महान सन्त और भारत की
आध्यात्मिक परम्परा के एक शिखर पुरुष थे। दुनिया उन्हें स्वामी विवेकानन्द के गुरु के रूप में भी जानती
है। बचपन से ही उन्हें ईश्वर प्राप्ति की लौ लग गयी थी। उनकी यह व्याकुलता बढ़ती गयी और वह
दिनोदिन ध्यान-साधना में अधिक प्रवृत्त होते गये। विवाह के बाद भी वह वैरागी और संन्यासी का ही
जीवन जोते रहे। उन्हें विलक्षण आध्यात्मिक अनुभूतियाँ होने लगीं। जब तब वह समाधि की
अवस्था में चले जाते। परमहंस इस मायने में अनूठे थे कि उन्होंने न सिर्फ भारत में चली आ रही भिन्न-
भिन्न आध्यात्मिक साधना पद्धतियों को साधा बल्कि इस्लाम और ईसाई धर्म में बतायी गयी
विधियों से भी आध्यात्मिक अभ्यास किया और इस नतीजे पर पहुँचे कि ये मार्ग भले अलग-अलग हों,
एक ही अनुभव तक ले जाते हैं, अर्थात सबका परम सत्य एक है। सब धर्मों के मूल में एक ही सत्य का
साक्षात्कार कर चुके श्रीरामकृष्ण परमहंस अपनी विचारदृष्टि में, सारे भेदभावों से परे, समस्त
मानवता के पुजारी थे। आज जब धर्म को वास्तविक समझ का अकाल है, श्रीरामकृष्ण परमहंस की
सिखावन का महत्त्व और बढ़ जाता है।


अवधेश प्रधान
10 नवम्बर 1952 को गाजीपुर (उ.प्र.) के सुल्तानपुर गाँव में जन्म। लगभग 40 वर्षों तक अध्यापन। बीएचयू के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर पद से जून 2020 में सेवानिवृत्त।
कृतियाँ: हिन्दी साहित्य के इतिहास की समस्याएँ, साहित्य और समय, कीर्तिलता और विद्यापति का युग, परम्परा की पहचान, सुदामा पाण्डेय धूमिल, सीता की खोज।
सम्पादन : काल्य और अर्थबोध, त्रिलोचन की दायरी, कविता का शुक्लपक्ष, नजरुल की हिन्दी कविताएँ, स्वामी विवेकानन्द संचयन, स्वामी सहजानन्द और किसान आन्दोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि, स्वामी सहजानन्द की आत्मकथा: मेरा जीवन संघर्ष, हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश (सात खण्ड)
अनुवाद: मेघदूत के गीत, मेरे गुरु स्वामी विवेकानन्द- जैसा उन्हें देखा (भगिनी निवेदिता)।
सम्मान: भगवतशरण उपाध्याय सम्मान (2009), सावित्री त्रिपाठी स्मृति सम्मान (2013), कबीर विवेक सम्मान (2014), कल्याण मल लोढ़ा शिक्षा सम्मान (2022)

Additional information

Author

Awadhesh Pradhan

Binding

Paperback

Language

Hindi

ISBN

9788119899142

Pages

384

Publisher

Setu Prakashan Samuh

Publication date

10-02-2024

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